भारत में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के अलावा और भी नए स्टॉक एक्सचेंज खुल सकते हैं। साथ ही देश में विदेशी स्टॉक एक्सचेंज (Foreign Stocks Exchanges) को भी एंट्री मिल सकती है। इससे निवेशकों का ट्रेडिंग कॉस्ट भी कम हो सकेगा, और उन्हें अधिक फायदा होगा। दरअसल, मार्केट रेगुलेटर सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) ने स्टॉक एक्सचेंज (Stocks Exchange) सहित दूसरे डिपोजिटरीज जिन्हें सामुहिक रूप से मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर इंस्टीट्यूशंस (MIIs) कहा जाता है, उनके मालिकाना हक यानी ऑनरशिप (Ownership) को लेकर कई बदलाव सुझाए हैं।
इन सुझावों के मुकाबिक, नए स्टॉक एक्सचेंज या MIIs में कोई कंपनी, संस्था या प्रमोटर्स 100% तक हिस्सदारी अपने पास रख सकते हैं। सेबी ने अपने इस प्रस्ताव पर 5 फरवरी तक फीडबैक मांगा है। SEBI के नए प्रस्तावों के मुताबिक, किसी स्टॉक एक्सचेंज या MIIs में कोई सिंगल विदेशी कंपनी 49% हिस्सेदारी तक रख सकती है। इससे नए स्टॉक एक्सचेंज के खुलने और विदेशी प्सेयर्स के आने का रास्ता साफ हो जाएगा। आपको बता दें कि अभी वर्तमान में स्टॉक एक्सचेंज में कोई कंपनी या संस्था मैक्सिमम 15% हिस्सेदारी की मालिक हो सकते हैं, जबकि कोई व्यक्ति अधिकतम 5% का स्टेक होल्डर हो सकता है।
अभी स्टॉक एक्सचेंज में किसी सिंगल विदेशी कंपनी की हिस्सेदारी अधिकतम 15% और विदेशी कंपनी की कुल हिस्सेदारी 49% तक हो सकती है। वर्तमान में, सेबी के नियमों के तहत एक्सचेंज अपनी 51 फीसदी हिस्सेदारी पब्लिक और 49 फीसदी हिस्सेदारी ट्रेडिंग मेंबर्स, एसोसिएट या एजेंट्स के पास रखते हैं। विदेशी ईकाई डोमेस्टिक स्टॉक एक्सचेंज में 15 फीसदी तक हिस्सेदारी रख सकते हैं।
फॉरेन प्लेयर्स को भी भारत में आने का मौका मिलेगा
SEBI द्वारा नए स्टॉक एक्सचेंज की योजना बनाने वाली ईकाईयों के मालिकाना हक में बदलाव को लेकर पेश इस प्रस्ताव के मुताबिक, नए स्टॉक एक्सचेंज की स्थापना के 10 साल के बाद किसी इंडिविजुअल (individual) का स्टेक 25% तक हो सकता है जिसका सीमा अभी केवल 5% है। वहीं, स्टॉक एक्सचेंज की स्थापना के 10 साल के अंदर नए प्रस्ताव के मुताबिक इंस्टीट्यूशंस को अपनी हिस्सेदारी घटाकर 26% करनी होगी। SEBI के ये प्रस्ताव अगर लागू हो जाते हैं तो देश में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के 16 साल का प्रभुत्व खत्म हो सकता है। साथ ही विदेशी स्टॉक एक्सचेंज को भी भारत में आने का मौका मिल सकता है।
सभी इक्विटी डेरिवेटिव्स का कारोबार NSE पर
अभी भारत में राष्ट्रीय स्तर पर BSE, NSE और मेट्रोपॉलिटन स्टॉक एक्सचेंज ही हैं। इनमें से ट्रेडिंग वॉल्युम और डेरिवेटिव्स सेग्मेंट में सबसे बड़ा एक्सचेंज NSE है। हालांकि, BSE एशिया का सबसे पुराना एक्सचेंज है, लेकिन बेहतर टेक्नोलॉजी होने के कारण लगभग सभी इक्विटी डेरिवेटिव्स का कारोबार NSE ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म पर ही होता है। भले ही शेयर बाजार में NSE का प्रभुत्व कायम है, लेकिन इसे भी कई तरह की तकनीकी खामियों का भी सामना करना पड़ा है, जैसे अचानक मार्केट क्रैश होने और निवेशकों को नुकसान होने के मामले सामने आए हैं। सेबी एक ऐसे ही मामले की जांच कर रहा है, जिसमें कुछ ट्रेडर्स ने एल्गोरिथम में बदलाव करके प्रायोरिटी आधार पर लाभ उठाया है। SEBI ने कहा है कि नए स्टॉक एक्सचेंज या डिपॉजिटरीज सेटअप करने से पहले उनका रिव्यू किया जाएगा।
इस तरह एंट्री मार सकेंगे विदेशी स्टॉक एक्सचेंज
अगर SEBI का यह प्रस्ताव लागू होता है तो इससे विदेशी एक्सचेंजों को भारत में आने का रास्त खुल जाएगा। वे किसी डोमेस्टिक प्लेयर के साथ ज्वाइंट वेंचर (Joint Venture) या मौजूदा स्टॉक एक्सचेंज में विलय के माध्यम से भारत में एंट्री कर सकेंगे। SEBI के इस प्रपोजल के तहत नई कंपनियां भी स्टॉक एक्सचेंज का अधिग्रहण कर सकेंगी या उनके साथ विलय कर सकेंगी।
नए स्टॉक एक्सचेंज आने से ये होंगे फायदे
नए स्टॉक एक्सचेंज आने प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और निवेशकों का ट्रेडिंग खर्च भी कम हो जाएगा। इससे अधिक से अधिक लोग इक्विटी मार्केट में निवेश कर सकेंगे। प्रतिस्पर्धा बढ़ने से मेंबरशिप और ब्रोकर्स के लिए क्लीयरिंग फीस भी कम करने में मदद मिलेगी। नए स्टॉक एक्सचेंज के सेटअप के लिए शुरुआत में प्रमोटर्स 100 फीसदी हिस्सेदारी रख सकते हैं और अगले 10 साल में इसे कम कर 51 फीसदी या 26 फीसदी कर सकते हैं।
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