शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव में फंसे रिटेल इनवेस्टर्स जानें कैसे बनाएं रणनीति

दरअसल छोटे निवेशकों या ट्रेडरों को बाजार में टिके रहने के लिए अपनी नजर मध्यम से लंबी अवधि पर टिका कर धैर्य के साथ टिक रहने चाहिए, तभी उन्हें सफलता मिल सकती है

अपडेटेड Sep 20, 2022 पर 7:47 AM
शेयर बाजार का तूफान तब तक शांत नहीं हो सकता जब तक इससे होने वाले नुकसान का पूरा अनुमान बाजार को न मिल जाए।

भुवन भास्कर

माना जाता है कि शेयर बाजार मध्यम से लंबी अवधि में अर्थव्यवस्था की सेहत का बैरोमीटर होते हैं। लेकिन छोटी अवधि में शेयर बाजार का व्यवहार अक्सर भ्रम पैदा कर देता है। शुक्रवार को भारतीय बाजारों के सूचकांक 2-2 प्रतिशत गिरे। कहा गया कि अमेरिकी फेड इस हफ्ते अपनी पॉलिसी समीक्षा में 75 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी कर सकता है, और इसलिए दुनिया भर के शेयर बाजार नर्वस हैं।

दुनिया भर में गिरावट आई है, तो भारत में भी बिकवाली का जोर बढ़ गया है। कमाल की बात यह है कि अभी फेड की पॉलिसी के नतीजे आने में 24-48 घंटे शेष हैं, लेकिन शुक्रवार की निराशा एकाएक सोमवार को बाजार से गायब दिख रही है। बाजार की शुरुआत गिरावट के साथ होने के कुछ ही देर बाद फिर खरीदारों का जोश वापस आ गया है। सोमवार 19 सितंबर को सेंसेक्स 300.44 अंक की तेजी के साथ 59,141.23 के लेवल पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी 91.40 अंक की तेजी के साथ 17,622.25 पर बंद हुआ। इन सबमें छोटा निवेशक या ट्रेडर हतप्रभ है कि किया क्या जाए।


छोटे निवेशक क्या करें?

दरअसल छोटे निवेशकों या ट्रेडरों को बाजार में टिके रहने के लिए अपनी नजर मध्यम से लंबी अवधि पर टिका कर धैर्य के साथ टिक रहने चाहिए, तभी उन्हें सफलता मिल सकती है। ऐसे में बाजार में निवेशकों को क्या रुख अपनाना चाहिए, इस सवाल का जवाब भारतीय और विश्व अर्थव्यवस्था की परिस्थितियों के विश्लेषण से मिल सकता है।

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वीकेंड के दौरान रेटिंग एजेंसी फिच ने एक बार फिर इस बात की पुष्टि की है कि अमेरिका और यूरोप मंदी के मुहाने पर खड़े हैं। फिच के मुताबिक यूरोजोन और ब्रिटेन इस साल के आखिर तक मंदी में चले जाएंगे, जबकि अमेरिका अगले साल मध्य तक मंदी में आ जाएगा। हालांकि अमेरिका की संभावित मंदी को ‘हल्की’ श्रेणी में बताया गया है। फिच ने 2022 के दौरान दुनिया की आर्थिक वृद्धि की संभावित दर को जून में घोषित 2.9% से आधा प्रतिशत कम कर 2.4% कर दिया है। वहीं 2023 में यह वृद्धि दर पहले जताई गई संभावना से 1% कम होकर अब 1.7% रहने की संभावना है।

कोरोना काल के दौरान ठप पड़ गई आर्थिक गतिविधियों में तेजी लाने के लिए आम जनता और उद्योगों को जो लाखों करोड़ डॉलर की मदद दुनिया भर में दी गई, उसका असर अब बढ़ती महंगाई के रूप में दिखने लगा है। इस महंगाई पर लगाम लगाने के लिए दुनिया भर के देशों ने जिस तरह ब्याज दरों में बढ़ोतरी शुरू की है, उससे अब धीरे-धीरे ग्रोथ पर ब्रेक लगने लगी है।

ग्रोथ पर ब्रेक का मतलब है मांग धीमी होना और जब मांग कमजोर पड़ती है तो स्वाभाविक तौर पर कमोडिटी की कीमतें नीचे आने लगती हैं। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। मांग कमजोर पड़ने और कीमतें नीचे आने से कंपनियों की प्रॉफिटैबिलिटी कम होने लगती है और उन्हें अपनी विस्तार योजनाओं पर रोक लगानी पड़ती है।

मुनाफा मार्जिन कम होने से आय प्रति शेयर (EPS) कम होती है और क्योंकि मांग कम होती है और भविष्य की संभावना धूमिल होने लगती है तो बाजार कंपनियों को कीमत और आय प्रति शेयर का कम अनुपात (PE) देने को तैयार होता है। जाहिर है कि इससे बिकवाली पैदा होती है। ऐसे में बाजार भले ही फिलहाल किसी दिन तेजी और किसी दिन मंदी दिखाए, लेकिन यह समझना आवश्यक है कि मध्यम से लंबी अवधि में अर्थव्यवस्था का रुझान क्या है। उस लिहाज से शेयर बाजार के लिए अगले साल भर बहुत उम्मीदपरक नहीं लगते।

फिलहाल कच्चे तेल की कीमतें जून की शुरुआत में दिखी उच्चतम कीमतों से प्रति बैरल 30 डॉलर नीचे आ चुकी हैं। वैश्विक बाजार का सबसे बड़े संकेतक फ्रेट रेट होते हैं यानी समुद्री जहाज से होने वाले माल परिवहन का भाड़ा। इन्हें दर्शाने वाले दुनिया के सबसे लोकप्रिय ड्रुरी वर्ल्ड कंटेनर इंडेक्स में पिछले हफ्ते 8% गिरावट दर्ज हुई जो लगातार 29वें हफ्ते की गिरावट है। अप्रैल 2021 के बाद पहली बार यह इंडेक्स 40 फुट कंटेनर के लिए 5000 डॉलर से नीचे गया है।

फिच में मुख्य अर्थशास्त्री ब्रायन कुल्टन ने कहा, “पिछले कुछ महीनों में हमने यूरोप में गैस संकट, ब्याज दरों में तेज बढ़त और चीन में गहराते रियल एस्टेट संकट के रूप में वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक परफेक्ट तूफान बनते हुए देखा है।” यह तूफान शेयर बाजार में तब तक डिस्काउंट नहीं हो सकता जब तक इससे होने वाले नुकसान का पूरा अनुमान बाजार को न मिल जाए।

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रॉयटर्स के सीनियर मार्केट एनालिस्ट जॉन केम्प ने मौजूदा परिस्थितियों पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि अमेरिका में हालांकि अभी जॉब मार्केट मजबूत स्थिति में है और आर्थिक गतिविधियां भी ऊंचे स्तर पर हैं, लेकिन वित्तीय बाजारों में-जैसा कि वहां के वायदा बाजार संकेत कर रहे हैं- अगले छह महीनों में आर्थिक चक्र में एक जबर्दस्त गिरावट, या मंदी के संकेत साफ उभर रहे हैं।

इन सब बातों को सुनने और समझने के बाद भारतीय शेयर बाजार के निवेशकों को दो बातें खास ध्यान में रखनी चाहिए। पहली, अमेरिकी बाजार या दुनिया के दूसरे सभी बाजार भारतीय बाजारों के लिए एक संकेत का काम करेंगे, लेकिन आखिर में भारतीय शेयर बाजार अपनी किस्मत के मालिक खुद होंगे। इसलिए क्योंकि भारत पूरी दुनिया के मंदी जाने के बावजूद लगभग 5-7% के दायरे में आर्थिक वृद्धि बरकरार रखेगा। फिर भी, यह मान लेना कि भारतीय शेयर बाजार अमेरिकी बाजारों से एकदम अलग चलेंगे, यह ठीक नहीं होगा।

दूसरी बात और महत्वपूर्ण है। बाजार हमेशा समय से आगे चलते हैं। तो जिस समय विश्व बाजार इस बात के लिए आश्वस्त होंगे कि अब मंदी का दौर बीत गया है, तब तक भारतीय शेयर बाजार लगभग अपने पुराने शीर्ष के पास पहुंच चुके होंगे। इसलिए बाजार में किनारे बैठ कर सही वक्त का इंतजार करने की जगह फंडामेंटल मजबूती वाली कंपनियों में छोटी मात्रा में लंबे समय के लिए लगातार निवेश करते रहना सही है। यही शेयर बाजार में सफलता का मूलमंत्र भी है।

(लेखक कृषि और आर्थिक मामलों के जानकार हैं)

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