मार्केट दिशा के लिए संघर्ष करता दिख रहा है। विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली जारी है। किसी सेक्टर में स्पष्ट ट्रेंड नहीं दिख रहा है। कुछ खास शेयरों में एक्टिविटी दिख रही है। खासकर रेलवे से जुड़ी कंपनियों में हलचल है। लेकिन, मार्केट प्लेयर्स से बातचीत करने से पता चलता है कि अभी अच्छा पैसा नहीं बन रहा है। कुल मिलाकर, बीते एक महीने का बात करें तो मार्केट में निराशा की जगह अब थकान दिख रही है।
Crompton Greaves Consumer के नए एमडी और सीईओ पद पर प्रोमित घोष की नियुक्ति का असर कंपनी के शेयरों पर पड़ा। यह शेयर 12 फीसदी गिरा। पिछले साल सितंबर से ही इस शेयरों पर दबाव रहा है। घोष एक इनवेस्टमेंट बैंकर रहे हैं। मैथ्यू जॉब के अचानक इस्तीफा के बाद घोष को नई जिम्मेदारी मिली है। जॉब पिछले साढ़े सात से कंपनी में थे। मार्केट इस बात को लेकर चिंतित है कि घोष को कंज्यूमर इलेक्ट्रिकल्स बिजनेस का अनुभव नहीं है।
क्या सरप्राइज करेंगे घोष?
खासकर ऐसे समय यह चिंता और बढ़ जाती है जब कंपनी की बाजार हिस्सेदारी में कमी देखने को मिल रही है। जेपी मॉर्गन की रिपोर्ट में कहा गया है कि नए सीईओ के पास ऑपरेशनल एक्सपीरियंस का अभाव इनवेस्टर्स के लिए चिंता की बात हो सकती है। निमेश शाह ने भी सीएनबीसीटीवी18 को बताया कि ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति हुई है जिसके पास इनवेस्टमेंट बैंकिंग का अनुभव है। मार्केट में इस बारे में चर्चा चल रही है। लेकिन, जब उम्मीदें कम होती हैं तो सरप्राइज करना आसान होता है। कंपनी की स्थिति ऐसी बन गई है, जिससे चीजें आगे बेहतर ही होंगी।
25 अप्रैल को Biocon के शेयरों में 2 फीसदी तेजी आई। Serum Institute ने Biocon Pharma को दिए अपने 15 करोड़ डॉलर के लोन को Biocon Biologics में इक्विटी इनवेस्टमेंट में बदल दिया है। इस डील के लिए बायोकॉन बायोलॉजिक्स की वैल्यूएशन 6 अरब डॉलर लगाई गई है। यह दो साल में 22 फीसदी की ग्रोथ है। मार्च में बायोकॉन के शेयरों की पिटाई हुई थी। यह 192 रुपये के साढ़े पांच साल के निचले स्तर पर आ गया था। एक बड़े संस्थागत निवेशक के कंपनी में हिस्सेदारी घटाने का असर उसके शेयर पर पड़ा था। मार्च के अपने निचले स्तर से यह शेयर करीब 15 फीसदी चढ़ चुका है। लेकिन, शेयरों में आगे की तेजी सब्सिडियरी की वैल्यूएशन को लेकर इनवेस्टर्स की सोच और फ्लैगशिप कपंनी के बिजनेस आउटलुक पर निर्भर करेगी।
पिछले महीने कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज ने इस शेयर में निवेश घटाने की अपनी सलाह बनाए रखी। उसने टारगेट प्राइस भी 240 रुपये से घटाकर 210 रुपये कर दिया। इसकी वजह Eli Lilly, Novo Nordisk और Sanofi का यह ऐलान था कि वे अगले साल से इंसुलिन की कीमतों में 65-80 फीसदी कमी करेंगी। इन कंपनियों की अमेरिकी इंसुलिन मार्केट में 90 फीसदी हिस्सेदारी है।
अमेरिकी बैंकिंग क्राइसिस को कुछ हद तक नियंत्रित कर लिया गया है। लेकिन, यह क्राइसिस पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है। First Republic Bank के फाइनेंशियल रिजल्ट को देखने से इसका संकेत मिलता है। कंपनी के नतीजे आने के बाद इस बैंक का शेयर क्रैश कर गया। दरअसल, मार्च में बैंक से 100 अरब डॉलर से ज्याता का डिपॉजिट निकाल लिया गया है। यह मार्केट के अनुमान के मुकाबले बहुत ज्यादा है। वॉल स्ट्रीट जर्नल ने बताया है कि डिपॉजिट में 100 अरब डॉलर की कमी के बाद बैंक ने कहा है कि वह 'स्ट्रेटिजिक ऑप्शंस' पर विचार कर रहा है। एनालिस्ट्स और इनवेस्टर्स भी यह देखने की कोशिश कर रहे हैं कि बैंक के पास क्या विकल्प हैं।