एक हफ्ते के अंदर अमेरिका के साथ इंडिया के व्यापारिक रिश्ते व्यापारिक टकराव में बदल गए हैं। पहले अमेरिका ने इंडियन गुड्स पर 25 फीसदी टैरिफ लगाया। उसके बाद अतिरिक्त 25 फीसदी टैरिफ का ऐलान कर दिया। रूस-यूक्रेन युद्ध को रोक पाने में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नाकामी का इसमें हाथ है। दरअसल, प्रतिबंधों के बावजूद इंडिया रूस से ऑयल खरीद रहा है, जो ट्रंप को पसंद नहीं है।
भारत पर लगा 25 फीसदी का अतिरिक्त टैरिफ 6 अगस्त के 21 दिन बाद लागू होगा। इससे इंडिया दुनिया के उन देशों की लिस्ट में शामिल हो गया है, जिन पर अमेरिका ने सबसे ज्यादा टैरिफ लगाया है। कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि इसका इंडिया की इकोनॉमी पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। कुछ एक्सपर्ट्स की राय इससे अलग है। उनका मानना है कि इसका असर इंडियन इकोनॉमी पर पड़ेगा।
इंडियन इकोनॉमी घरेलू मांग पर ज्यादा निर्भर है। इंडिया की कुल GDP में प्राइवेट कंजम्प्शन की हिस्सेदारी 60 फीसदी तक है। करीब 4 लाख करोड़ डॉलर की इकोनॉमी में अमेरिका को होने वाले एक्सपोर्ट की हिस्सेदारी 90 अरब डॉलर से कम है। इसके अलावा इनमें से कई चीजों का एक्सपोर्ट मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN) के नियमों के तहत आता है। कुछ आइटम्स को टैरिफ से छूट हासिल है। इस हफ्ते आई उद्योग चैंबर PHDCCI की स्टडी में कहा गया है कि 25 फीसदी टैरिफ का असर इंडिया के करीब 8 अरब डॉलर के एक्सपोर्ट पर पड़ेगा। यह इंडिया की जीडीपी का सिर्फ 0.2 फीसदी है।
लेकिन, 50 फीसदी टैरिफ का ज्यादा असर पड़ेगा। हालांकि, फार्मास्युटिकल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स अभी ट्रंप के टैरिफ के दायरे से बाहर हैं। पेट्रोकेमिकल्स और ऑटो कंपोनेंट्स पर कम टैरिफ लगता है। इसका मतलब है कि इंडिया से अमेरिका को होने वाले करीब 30 अरब डॉलर के एक्सपोर्ट पर टैरिफ का ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। जिन सेक्टर के गुड्स पर ट्रंप के टैरिफ का असर पड़ेगा, उनमें इंजीनियरिंग गुड्स, टेक्सटाइल्स और जेम्स एंड ज्वैलरी शामिल हैं। इनकी अमेरिका को होने वाले कुल एक्सपोर्ट में करीब 40 फीसदी हिस्सेदारी है।
इंडियन गुड्स पर 50 फीसदी और दूसरे देशों के गुड्स पर इससे कम टैरिफ की वजह से अमेरिकी बाजार में इंडियन प्रोडक्ट्स महंगे हो जाएंगे। उदाहरण के लिए, टेक्सटाइल्स में इंडियन प्रोडक्ट्स का मुकाबला बांग्लादेश से है। बांग्लादेश के टैक्सटाइल्स प्रोडक्ट्स पर 20 फीसदी टैरिफ है। ट्रंप के चीन की जगह इंडिया को निशाना बनाने की वजह से अब चीन के मुकाबले भी इंडियन प्रोडक्ट्स सस्ते नहीं रह जाएंगे। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च एनिशिएटिव (GTRI) के मुताबिक, FY26 में अमेरिका को इंडिया का एक्सपोर्ट 40-50 फीसदी तक घट सकता है। यह जीडीपी का करीब 1 फीसदी है।
इंडिया में रोजगार पर भी इसका बड़ा असर पड़ेगा। खासकर मरीन प्रोडक्ट्स, ऑर्गेनिक केमिकल्स और अपैरल पर ज्यादा असर पड़ेगा जिनके उत्पादन में लेबर यानी श्रम का ज्यादा इस्तेमाल होता है।
इंडिया ने कहा है कि वह अपने हितों की रक्षा के लिए सभी जरूरी उपाय करेगा। इंडिया के पास रूस की जगह दूसरे तेल उत्पादक देशों से इंपोर्ट का रास्ता खुला है। इससे इंडिया अतिरिक्त 25 फीसदी टैरिफ से बच जाएगा। अभी इंडिया करीब एक-तिहाई क्रूड का आयात रूस से करता है। रूस से तेल खरीदना इंडिया के लिए काफी सस्ता पड़ता है। इंडिया के दूसरे देशों से तेल खरीदने पर इंपोर्ट बिल बढ़ेगा। इससे ट्रेड डेफिसिट भी बढ़ेगा। हाल में रूस से तेल खरीदने पर मिलने वाला डिस्काउंट घटा है। इससे इंडिया के लिए दूसरे देशों से तेल खरीदना आसान हो गया है।
इंडिया नए एक्सपोर्ट मार्केट की तलाश कर रहा है। हाल में यूनाइटेड किंग्डम के साथ ट्रेड समझौता इसका एक उदाहरण है। इससे इंडिया को कुछ सपोर्ट मिलेगा। अब इंडिया यूरोपीय संघ से डील के लिए चल रही बातचीत पर फोकस बढ़ाएगा। ASEAN देशों के साथ भी व्यापार बढ़ रहा है। उधर, रूस ने रूस-इंडिया-चीन की तिकड़ी को फिर से मजबूत बनाने की जरूरत बताई है। इससे अमेरिकी मनमानी का सामना करने में मदद मिलेगी।
इनवेस्टर्स को क्या करना चाहिए?
इंडियन स्टॉक मार्केट्स पर ट्रंप के टैरिफ का कितना असर पड़ेगा, यह अभी बताना मुश्किल है। 50 फीसदी टैरिफ के ऐलान के बाद Nifty 1 फीसदी से ज्यादता गिरा है। 8 अगस्त को भी इंडियन मार्केट्स पर काफी दबाव देखने को मिला। बाजार की दिशा अमेरिका और इंडिया के बीच डील को लेकर होने वाली बातचीत के नतीजों पर निर्भर करेगी। लेकिन, जिस तरह से ट्रंप इंडिया के एग्रीकल्चर और डेयरी सेक्टर को खोलने की अपनी मांग पर अड़े हुए हैं उससे यह कहना मुश्किल है कि आगे क्या होगा।
शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म इनवेस्टर्स को उन सेक्टर्स की कंपनियों के स्टॉक्स से दूर रहना फायदेमंद है, जिन पर ट्रंप के टैरिफ का ज्यादा असर पड़ने वाला है। अगर ट्रंप के टैरिफ का खराब असर अमेरिकी इकोनॉमी पर पड़ता है तो यह आईटी कंपनियों के लिए अच्छा नहीं होगा। आईटी कंपनियां अमेरिकी इकोनॉमी पर काफी ज्यादा निर्भर हैं। लेकिन, इंडियन इकोनॉमी की मुश्किलों से उबरने की क्षमता को देखते हुए इनवेस्टर्स को मार्केट में गिरावट के मौके का इस्तेमाल स्ट्रॉन्ग बिजनेस और कम वैल्यूएशन पर अच्छी कंपनियों के स्टॉक्स को खरीदने के लिए करना चाहिए।
(रॉय क्रेडिटबुल कैपिटल की फाउंडर हैं)