Tata Trusts vs Tata Sons Conflict: टाटा ग्रुप में महासंग्राम छिड़ा हुआ है। टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन के दूसरे कार्यकाल की नियुक्ति और कंपनी को शेयर बाजार में लिस्ट कराने को लेकर विवाद चरम पर पहुंच गया है। इस मुद्दे पर टाटा संस और टॉप शेयरधारक टाटा ट्रस्ट्स आमने-सामने हैं।
इस हाई-प्रोफाइल कॉरपोरेट जंग को जीतने के लिए टाटा ट्रस्ट्स ने देश के दिग्गज वकील अभिषेक मनु सिंघवी को मैदान में उतार दिया है। सिंघवी की एंट्री से इस कानूनी लड़ाई के तेवर और तीखे हो गए हैं।
आइए समझते हैं इस बड़े विवाद की असली वजह क्या है और अभिषेक मनु सिंघवी के उन बयानों के पीछे का गणित क्या है, जिसने कॉरपोरेट जगत से लेकर शेयर बाजार तक में हड़कंप मचा दिया है:
क्यों भड़का टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस में विवाद?
विवाद की मुख्य वजह 17 सितंबर को हुई टाटा संस के बोर्ड की बैठक है। टाटा संस के बोर्ड ने एन चंद्रशेखरन को अगले 5 सालों के लिए फिर से चेयरमैन नियुक्त करने का प्रस्ताव पास किया। टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया। टाटा ट्रस्ट्स की टाटा संस में लगभग 66% हिस्सेदारी है। ट्रस्ट्स ने इस प्लान को 'गैर-कानूनी' और 'कानूनी रूप से शून्य' करार दिया।
विवाद की एक और वजह टाटा संस की लिस्टिंग बनी हुई है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा टाटा संस की कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की याचिका खारिज होने के बाद, कंपनी को शेयर बाजार में लिस्ट कराने को लेकर भी दोनों धड़ों के बीच सहमति नहीं बन पा रही है।
अभिषेक मनु सिंघवी को मैदान में उतारा
दिग्गज वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी बात रखते हुए कहा कि वे दिवंगत रतन टाटा और दोनों पक्षों के प्रमुख लोगों के करीब रहे हैं, इसलिए वे भारी मन से यह केस लड़ रहे हैं। इस मामले में सिंघवी ने कॉरपोरेट गवर्नेंस और शेयरधारकों के अधिकारों पर कई गंभीर सवाल उठाए।
सिंघवी ने कहा, 'मौजूदा मामले में शेयरधारक-मालिकों के मौलिक अधिकारों को खारिज नहीं किया जा सकता। शेयरधारिता अधिकारों को दबाना देश की सैकड़ों कंपनियों के कॉरपोरेट गवर्नेंस के लिए कयामत जैसा होगा।'
उन्होंने टाटा-मिस्त्री मामले में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले की याद दिलाते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने टाटा संस के साथ संबंधों में टाटा ट्रस्ट्स की प्रधानता को साफ तौर पर स्वीकार किया था, जिसे अब चुनिंदा तरीके से भुलाया जा रहा है।
सिंघवी ने कहा कि टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के 100 साल से भी पुराने रिश्ते को एक-दूसरे से अलग करना अकल्पनीय है। जब आपसी भाईचारा और सौहार्द खत्म हो जाता है, तो ऐसे मामलों का समाधान केवल कानूनी रास्ते से ही निकल सकता है।
टाटा संस की ओर से हरीश साल्वे करेंगे पैरवी
दूसरी तरफ, टाटा संस की ओर से भी दिग्गज वकीलों की फौज तैयार है। वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने इस गतिरोध पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कोई भी कंपनी लगातार गतिरोध की स्थिति में काम नहीं कर सकती। निदेशक मंडल और शेयरधारकों को कंपनी के दैनिक कामकाज और दीर्घकालिक रणनीतियों के लिए एक व्यावहारिक रास्ता खोजना ही होगा।
शेयर बाजार और टाटा ग्रुप की कंपनियों पर असर
दोनों धड़ों के बीच जारी इस जंग का असर टाटा ग्रुप की लिस्टेड कंपनियों पर भी देखने को मिल रहा है। इस विवाद की खबर बाहर आते ही टाटा ग्रुप के शेयरों के मार्केट कैप में करीब ₹40,000 करोड़ तक की गिरावट दर्ज की गई है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह विवाद जल्द नहीं सुलझा, तो टाटा ग्रुप के बड़े निवेश फैसलों, फंडिंग और भविष्य की रणनीतियों पर बुरा असर पड़ सकता है।