दिग्गज फंड मैनेजर प्रशांत जैन ने भारतीय शेयर बाजारों में जोरदार रिकवरी का अनुमान जताया है। लेकिन, यह अनुमान इस सोच पर आधारित है कि अमेरिकी बॉन्ड्स यील्ड जल्द सामान्य लेवल पर आ जाएगी। सवाल है कि अगर अमेरिकी बॉन्ड्स यील्ड नीचे नहीं आई तो क्या होगा?
दिग्गज फंड मैनेजर प्रशांत जैन ने भारतीय शेयर बाजारों में जोरदार रिकवरी का अनुमान जताया है। लेकिन, यह अनुमान इस सोच पर आधारित है कि अमेरिकी बॉन्ड्स यील्ड जल्द सामान्य लेवल पर आ जाएगी। सवाल है कि अगर अमेरिकी बॉन्ड्स यील्ड नीचे नहीं आई तो क्या होगा?
शेयर बाजारों में माहौल काफी बदल सकता है
प्रशांत जैन ने 3पी इनवेस्टमेंट मैनेजर्स के सितंबर तिमाही के लेटर में बताया है कि अमेरिकी बॉन्ड यील्ड के 6 फीसदी के ऊपर जाने पर उनके आउटलुक को रिस्क हो सकता है। ऐसी स्थिति में ग्लोबल मार्केट्स में माहौल काफी बदल सकता है। ग्रोथ सुस्त पड़ सकती है। इनवेस्टमेंट में कमी आ सकती है। कॉर्पोरेट प्रॉफिट्स में कमी आ सकती है और शेयरों की वैल्यूएशंस घट सकती है।
बॉन्ड यील्ड के सामान्य स्तर पर आ जाने की उम्मीद
जैन का कहना है कि हालांकि इसकी उम्मीद बहुत कम है। लेकिन, निवेशकों को इसके लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि इसके नतीजे गंभीर हो सकते हैं। फिर भी उनका मानना है कि आगे स्थितियां सामान्य हो जाएंगी। मॉर्गन स्टेनली, जेपी मॉर्गन और गोल्डमैन सैक्स ने भी इस साल के अंत तक बॉन्ड यील्ड के 4.75-5 फीसदी के बीच रहने का अनुमान जताया है। 3पी इनवेस्टमेंट मैनेजर्स के लेटर में यह बताया गया है।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में लगातार उछाल की वजहें
अमेरिकी सरकार के बढ़ते फिस्कल डेफिसिट और सरकार के कर्ज लेने की कॉस्ट बढ़ने से बॉन्ड यील्ड बढ़ रही है। अमेरिका सरकार का कर्ज बढ़कर 40 लाख करोड़ (ट्रिलियन) डॉलर के करीब पहुंच गया है। यह जीडीपी का करीब 32.5 फीसदी है। 3.5 फीसदी की कर्ज की औसत कॉस्ट के हिसाब से अमेरिकी सरकार को इंटरेस्ट चुकाने पर 1.37 लाख करोड़ डॉलर खर्च करना होगा। यह जीडीपी का 4.2 फीसदी है। इससे सरकार का फिस्कल डेफिसिट बढ़ेगा। साथ ही मैच्योर होने वाले बॉन्ड्स के पैसे चुकाने के लिए सरकार को ज्यादा इंटरेस्ट रेट पर कर्ज लेना होगा।
सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा असर
खास बात यह है कि यह समस्या सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगी। यूरोप, जापान सहित कई देशों में फिस्कल डेफिसिट बढ़ने की वजह से बॉन्ड्स यील्ड बढ़ रही है। जैन ने कहा कि अमेरिकी बॉन्ड यील्ड के 6 फीसदी के पार जाने पर इसका असर सिर्फ सरकार की वित्तीय स्थिति पर नहीं पड़ेगा बल्कि इसका व्यापक असर होगा। यील्ड ज्यादा होने पर इनवेस्टर्स की दिलचस्पी बॉन्ड में बढ़ेगी। इससे शेयरों की वैल्यूएशन पर दबाव बनेगा।
पूरे फाइनेंशियल सिस्टम पर असर पड़ने का अनुमान
ज्यादा बॉन्ड यील्ड का खराब असर इनवेस्टमेंट पर भी पड़ेगा। इकोनॉमिक ग्रोथ सुस्त पड़ने पर कंपनियों की अर्निंग्स घटेगी। फाइनेंशियल स्ट्रेस का असर बैंकों और कर्ज लेने वालों पर भी पड़ेगा। इससे बैंकों की एसेट क्वालिटी में गिरावट का खतरा बढ़ जाएगा। जहां तक इंडिया की बात है तो यह इस झटके को बर्दाश्त करने के लिहाज से अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है।
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भारत स्थिति का सामना करने के लिहाज से मजबूत स्थिति में
इंडिया में विदेशी मुद्रा भंडार करीब 700 अरब डॉलर का है। यह FY24-26 के दौरान औसत करेंट-अकाउंट डेफिसिट का 28 गुना है। एफडीआई में भी इम्प्रूवमेंट है। नेट इनफ्लो इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में करीब 8 अरब डॉलर रहा। इसके अलावा भारत ने FCNR(B) डिपॉजिट से 136 अरब डॉलर जुटाए हैं। इससे विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूती मिली है।
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