US-Iran War: मिडिल-ईस्ट में छिड़ी जंग, शेयर बाजार के लिए खतरे की घंटी? जानें आपके निवेश पर क्या पड़ेगा असर
Middle East Conflict: ईरान में अभी चल रही लड़ाई के नतीजे हाल के दूसरे लड़ाइयों या युद्धों से ज्यादा बड़े हो सकते हैं। अमेरिका-इजराइल गठबंधन ने ईरान की टॉप लीडरशिप को मार गिराया है। इसके जवाब में ईरान ने अमेरिका का साथ देने वाले मिडिल ईस्ट देशों पर हमले किए हैं, जिसने पूरे इलाके को युद्ध के खतरे में डाल दिया है। भारत के लिए यह इलाका काफी अहम है
Middle East Conflict: युद्ध के बढ़ते खतरे के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग $8 प्रति बैरल बढ़ गई
Middle East Conflict: ईरान में अभी चल रही लड़ाई के नतीजे हाल के दूसरे लड़ाइयों या युद्धों से ज्यादा बड़े हो सकते हैं। अमेरिका-इजराइल गठबंधन ने ईरान की टॉप लीडरशिप को मार गिराया है। इसके जवाब में ईरान ने अमेरिका का साथ देने वाले मिडिल ईस्ट देशों पर हमले किए हैं, जिसने पूरे इलाके को युद्ध के खतरे में डाल दिया है। भारत के लिए यह इलाका काफी अहम है। करीब 90 लाख भारतीय मिडिल ईस्ट में रहते हैं। भारत को विदेशों से आने वाली कुल रकम यानी रेमिटेंस का 38 फीसदी इसी इलाके से आता है।
भारत के एक्सपोर्ट का लगभग 15 परसेंट मिडिल ईस्ट को जाता है और इसके कुल इम्पोर्ट का 21 परसेंट उसी इलाके से होता है। इसमें यूनाइटेड अरब अमिरेट्स (UAE), इराक और सऊदी अरब भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदार हैं, जहां से सबसे ज्यादा इंपोर्ट-एक्सपोर्ट होता है।
अगर होर्मुज जलडमरूमध्य बंद हो जाता है तो क्या होगा?
ग्लोबल इकॉनमी और शेयर बाजार के लिए सबसे बड़ी चिंता यही है कि कहीं होर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावट या नाकाबंदी न हो जाए। इसी रास्ते से रोज लगभग 2 करोड़ बैरल कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद गुजरते हैं। यह दुनिया की कुल तेल खपत का करीब 20% हिस्सा है।
यह एक संकरा समुद्री रास्ता है, जो फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। इसी रास्ते से बड़ी मात्रा में फर्टिलाइजर, मेथनॉल और LNG भी दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचाई जाती है। अगर यह रास्ता बंद होता है, तो ग्लोबल सप्लाई पर बड़ा असर पड़ सकता है।
इस समय हालात ऐसे हैं कि व्यापार पर हर तरफ असर दिख रहा है। जापान की बड़ी शिपिंग कंपनियों ने अपने ऑपरेशन रोक दिए हैं। एलएनजी (LNG) की सप्लाई भी ठप हो गई है। खबर है कि युद्ध से जुड़े जोखिम का बीमा करने वाली कंपनियां (अंडरराइटर्स) जहाज मालिकों की पॉलिसी रद्द करना शुरू कर रही हैं।
अगर मौजूदा कच्चे तेल की सप्लाई की बात करें, तो लगभग 2 करोड़ बैरल प्रति दिन (20 मिलियन बैरल प्रतिदिन) तेल की खेप खतरे में है। हालांकि, कुछ वैकल्पिक रास्ते भी मौजूद हैं।
सऊदी अरामको 50 लाख बैरल प्रतिदिन क्षमता वाली ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन चलाती है। यह पाइपलाइन फारस की खाड़ी के पास अबकैक ऑयल प्रोसेसिंग सेंटर से लाल सागर के यनबू बंदरगाह तक जाती है। इसके अलावा यूनाइटेड अरब अमिरेट्स (UAE) भी एक पाइपलाइन चलाता है, जो होर्मुज जलडमरूमध्य को बायपास करती है और उसकी क्षमता 18 लाख बैरल प्रतिदिन है।
लेकिन कुल मिलाकर केवल लगभग 25 लाख बैरल प्रतिदिन अतिरिक्त क्षमता उपलब्ध है। ऐसे में वास्तविक तौर पर करीब 1.75 लाख बैरल प्रतिदिन की तेल सप्लाई बाधित हो सकती है।
दूसरी ओर, US EIA के अनुसार, इस समय कच्चे तेल और तेल उत्पादों की अतिरिक्त सप्लाई लगभग 33 लाख बैरल प्रतिदिन है। यही वजह थी कि हाल तक तेल की कीमतें ज्यादा नहीं बढ़ रही थीं। OPEC ने अप्रैल से सप्लाई को 2.06 लाख बैरल प्रतिदिन बढ़ाने का फैसला किया है। लेकिन अगर तेल की सप्लाई में कोई बड़ी रुकावट आती है, तो मौजूदा अतिरिक्त तेल की स्थिति अचानक करीब 1.4 करोड़ बैरल प्रतिदिन के घाटे में बदल सकती है।
भारत की बात करें तो दिसंबर 2025 के आंकड़ों के अनुसार, भारत के कच्चे तेल का 58% हिस्सा मिडिल ईस्ट से आता था। रूस से तेल की सप्लाई घट जाने के कारण यह हिस्सा और बढ़ गया होगा।
इसका मतलब यह है कि भारत के लिए, अगर मिडिल ईस्ट में सप्लाई बाधित होती है, तो भारत को अमेरिका और लैटिन अमेरिका से तेल की खरीदारी बढ़ानी पड़ सकती है, और रूस से सप्लाई फिर से शुरू हो सकती है। अनुमान है कि भारत को मिलने वाले कच्चे तेल का लगभग 45% हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरता है।
पिछले महीने, युद्ध के बढ़ते खतरे के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग $8 प्रति बैरल बढ़ गई। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर क्षेत्रीय तनाव और तेल की कमी जारी रहती है, तो कीमत आसानी से $90 प्रति बैरल से ऊपर जा सकती है।
भारतीय इकोनॉमी के लिए सिनेरियो
हमारा मानना है कि कच्चे तेल में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी होती है तो यह रिटेल महंगाई पर 50 बेसिस पॉइंट्स (bps) और GDP ग्रोथ पर 20 bps तक असर डाल सकती है। हमारे अनुमान के मुताबिक, अगर होर्मुज स्ट्रेट अधिक समय (करीब 3 महीने) तक ब्लॉक रहता है, तो ट्रेड डेफिसिट 30 परसेंट तक बढ़ सकता है। जाहिर है, इससे फिस्कल मैनूवरेबिलिटी पर बहुत बुरा असर पड़ेगा, और RBI सख्त रुख अपना सकता है। भारत के सामने एक और बड़ी चुनौती महंगाई की है। एल नीनो की स्थिति बनने के कारण कमजोर इस साल मॉनसून कमजोर रहने की आशंका जताई जा रही है।
तेल से जुड़े डाउनस्ट्रीम सेक्टर्स पर असर
जिन सेक्टर्स का कच्चे तेल और उसके उत्पादों पर निर्भरता है, उन पर नेगेटिव असर पड़ सकता है। इनमें केमिकल्स, पेंट्स, फार्मा, एपीआई (API), एयरलाइंस, टायर, एग्रोकेमिकल्स और ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs) शामिल हैं। मिडिल-ईस्ट में काम करने वाली कुछ कंपनियां, जैसे L&T, अडानी पोर्ट्स, और कुछ चुनिंदा FMCG और केमिकल कंपनियां भी प्रभावित हो सकती हैं।
इसके उलट, अपस्ट्रीम ऑयल कंपनियां (जो तेल उत्पादन में लगी हैं) को फ़ायदा हो सकता है, बशर्ते सरकार उन्हे कच्चे तेल की ऊंची तेल कीमतों का लाभ लेने की अनुमति दे। डिफेंस सेक्टर को पॉज़िटिव सेंटीमेंट से सपोर्ट मिलेगा क्योंकि ग्लोबल डिफेंस खर्च का मामला मज़बूत होता जा रहा है। इसके अलावा, सोने की ज़्यादा कीमतें ज्वेलरी कंपनियों के लिए पॉज़िटिव हैं, लेकिन मिडिल ईस्ट में रिटेल मौजूदगी वाली ज्वेलरी कंपनियों को दिक्कत हो सकती है।
ग्लोबल असर – महंगाई में बढ़ोतरी
दुनिया भर में इसका असर मुख्य रूप से एनर्जी की कीमतों में बढ़ोतरी के रूप में दिखाई देगा। S की बात करें तो, टैरिफ के असर को छोड़कर बाक चीज़ों की महंगाई काफी हद तक काबू में थी। लेकिन अगर मिडिल ईस्ट में लड़ाई लंबे समय तक खीचती है तो इससे रिटेल महंगाई दर बढ़ सकती है और नए फेड चेयर केविन वार्श का काम मुश्किल हो सकता है।
जहां तक चीन की बात है, तो वह मिडिल ईस्ट से 40 परसेंट से ज्यादा क्रूड ऑयल इंपोर्ट करता है। उसके ऑयल स्टॉक की वजह से वह कई महीनों की रुकावट झेलने के लिए अच्छी स्थिति में है। चीन के पास ऑनशोर 1.2 बिलियन बैरल ऑयल स्टोरेज में था, जो 2025 के लेवल पर 104 दिनों के नेट क्रूड ऑयल इंपोर्ट को कवर करेगा। इसके अलावा, उसने हाल ही में रूस से भी इंपोर्ट तेजी से बढ़ाया है।
भारत के लिए, कमर्शियल तेल स्टॉक और रिजर्व लगभग 60 दिनों का सहारा दे सकते हैं।
युद्ध का असर आम तौर पर शॉर्ट टर्म होता है
आम तौर पर, बड़े सैन्य संघर्षों का असर जोखिम भरे निवेशों पर शॉर्ट-टर्म के लिए ही होता है। मीडियम अवधि में, शेयर बाजार आमतौर पर फिर से उबरता है, और तनाव के पीक समय को शेयर बाजार में निवेश बढ़ाने का अवसर माना जाता है। इसलिए, जो निवेशक US-इंडिया ट्रेड डील के बाद मार्केट में आए उछाल से चूक गए, उनके पास अब निवेश का मौका हो सकता है।
(इस आर्टिकल को मनीकंट्रोल प्रो के स्पेशल एनालिस्ट, अनुभव साहू ने लिखा है)
डिस्क्लेमरः Moneycontrol पर एक्सपर्ट्स/ब्रोकरेज फर्म्स की ओर से दिए जाने वाले विचार और निवेश सलाह उनके अपने होते हैं, न कि वेबसाइट और उसके मैनेजमेंट के। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। Moneycontrol यूजर्स को सलाह देता है कि वह कोई भी निवेश निर्णय लेने के पहले सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह लें।