US Iran Deal: अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता होने से कच्चे तेल की कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल तक फिसल गई है। इससे बाजार का माहौल बदलता दिख रहा है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अब रिटर्न का अगला बड़ा दौर शेयर बाजार से आ सकता है।
US Iran Deal: अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता होने से कच्चे तेल की कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल तक फिसल गई है। इससे बाजार का माहौल बदलता दिख रहा है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अब रिटर्न का अगला बड़ा दौर शेयर बाजार से आ सकता है।
पश्चिम एशिया में तनाव के दौरान शेयर बाजार दबाव में था। लेकिन अब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दोबारा खुलने से तेल सप्लाई का बड़ा जोखिम कम हो गया है। इससे कई भारतीय कंपनियों की लागत घट सकती है। साथ ही विदेशी निवेशकों (FII) की वापसी की उम्मीद भी बढ़ी है।
शेयर बाजार को क्यों मिल सकता है फायदा?
Geojit Investments के रिसर्च हेड विनोद नायर का कहना है कि पश्चिम एशिया संकट का असर भारतीय शेयर बाजार पर सबसे ज्यादा पड़ा था, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से तेल खरीदकर पूरा करता है।
उनके मुताबिक जैसे-जैसे कच्चे तेल की कीमतें नीचे आएंगी, भारतीय शेयरों को राहत मिलेगी। दूसरी तरफ बॉन्ड, सोना और दूसरी कमोडिटीज में फिलहाल उतनी मजबूती नहीं दिख रही है।
IIFL Capital के जॉइंट CEO प्रकाश बुलुसु का कहना है कि जब भू-राजनीतिक तनाव कम होता है, तो निवेशकों का फोकस फिर से कंपनियों की कमाई, अर्थव्यवस्था की स्थिति और नए निवेश पर लौट आता है। ऐसे माहौल में शेयर बाजार बेहतर प्रदर्शन कर सकता है।
किन सेक्टर को सबसे ज्यादा फायदा होगा?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि बाजार को फायदा मिल सकता है, लेकिन हर सेक्टर पर असर एक जैसा नहीं होगा। विनोद नायर के मुताबिक OMCs सबसे पहले फायदा उठा सकती हैं। कच्चा तेल सस्ता होने पर उनकी लागत घटती है और मुनाफे पर दबाव कम होता है।
आनंद राठी वेल्थ के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अमिताभ लारा का कहना है कि एविएशन, ट्रांसपोर्ट, लॉजिस्टिक्स, टायर और पेंट कंपनियों को भी सस्ते तेल का सीधा फायदा मिल सकता है।
उनकी सलाह है कि इक्विटी पोर्टफोलियो में करीब 50-55% हिस्सा लार्जकैप, 20-22% मिडकैप और बाकी हिस्सा स्मॉलकैप शेयरों में रखा जा सकता है।
मिडकैप और स्मॉलकैप में भी दिख सकता है दम
प्रकाश बुलुसु का मानना है कि आने वाले समय में कमाई का बड़ा मौका पूरे बाजार की बजाय चुनिंदा शेयरों में मिलेगा। उनके मुताबिक घरेलू ग्रोथ, मैन्युफैक्चरिंग, फाइनेंशियल सर्विसेज, इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी से जुड़ी कंपनियों में अच्छे मौके बन सकते हैं। मजबूत कमाई वाली क्वालिटी मिडकैप कंपनियां भी निवेशकों को आकर्षित कर सकती हैं।
Emkay Wealth Management के रिसर्च हेड जोसेफ थॉमस का कहना है कि पश्चिम एशिया संकट के दौरान मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में सबसे ज्यादा गिरावट आई थी। ऐसे में अगर विदेशी निवेशक वापस लौटते हैं, तो इन शेयरों में ज्यादा तेजी देखने को मिल सकती है।
उनका यह भी मानना है कि निवेशकों को सिर्फ पारंपरिक लार्जकैप शेयरों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। नई पीढ़ी की मजबूत ग्रोथ वाली कंपनियों पर भी नजर रखी जा सकती है।
सोना, बॉन्ड और कमोडिटीज पर क्या राय है?
ज्यादातर एक्सपर्ट्स फिलहाल सोना, बॉन्ड और दूसरी कमोडिटीज को रिटर्न का बड़ा जरिया नहीं मान रहे हैं। अमिताभ लारा और प्रकाश बुलुसु का कहना है कि पिछले 12 से 18 महीनों में सोना और चांदी पहले ही अच्छा रिटर्न दे चुके हैं। इसलिए यहां से बहुत बड़ी तेजी की उम्मीद कम है।
हालांकि बुलुसु का मानना है कि पोर्टफोलियो में संतुलन बनाए रखने के लिए थोड़ी हिस्सेदारी सोने में रखना अब भी समझदारी हो सकती है। जोसेफ थॉमस के मुताबिक विकसित देशों में ऊंची ब्याज दरें कमोडिटी बाजार के लिए चुनौती बनी रह सकती हैं।
निवेशकों को क्या करना चाहिए?
अमिताभ लारा लंबी अवधि के निवेशकों के लिए 80:20 का इक्विटी और डेट अनुपात सुझाते हैं। उनका कहना है कि किसी एक भू-राजनीतिक घटना को देखकर जल्दबाजी में निवेश रणनीति नहीं बदलनी चाहिए।
वहीं प्रकाश बुलुसु का कहना है कि निवेशकों को शेयर बाजार, फिक्स्ड इनकम और थोड़े-बहुत गोल्ड का तालमेल रखना चाहिए। उनके मुताबिक लंबे समय में बेहतर और स्थिर रिटर्न के लिए अलग-अलग एसेट क्लास में निवेश करना सबसे जरूरी है।
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