जीरोधा के को-फाउंडर नितिन कामत ने ट्रेडर्स की रिस्क वाले इंस्ट्रूमेंट्स में दिलचस्पी बढ़ने की वजह बताई है। उन्होंने इस बारे में एक पोस्ट किया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपने इस पोस्ट में उन्होंने कहा है कि फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस में इनवेस्टर्स की बढ़ती दिलचस्पी रोकने के लिए एसटीटी बढ़ाने सहित दूसरे उपायों का मकसद पूरा नहीं हुआ है।
एसटीटी लगातार बढ़ाने का असर
कामत ने अपने पोस्ट में कहा है, "एफएंडओ स्पेकुलेशन रोकने के लिए एसटीटी बढ़ाने और दूसरे उपायों ने ट्रेडर्स को ट्रेडिंग में रिस्क लेने की तरफ धकेला है।" उन्होंने बताया है कि जीरोधा के प्लेटफॉर्म पर सिर्फ 10 फीसदी ऑप्शन बायर्स के मुकाबले करीब 50 फीसदी इंडिविजुअल फ्यूचर्स ट्रेडर्स और 40 फीसदी ऑप्शंस सेलर्स प्रॉफिट में थे।
पिछले कुछ सालों में फ्यूचर्स पर बढ़ा है एसटीटी
जीरोधा के को-फाउंडर ने मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी (MTF) के बारे में कहा है कि इससे होने वाले मुनाफे के बारे में कुछ कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि यह अपेक्षाकृत नया प्रोडक्ट है। उन्होंने कहा कि सभी F&O ट्रेडिंग एक्टिविटी में ऑप्शंस की हिस्सेदारी करीब 90 फीसदी है। ट्रेडर्स के फ्यूचर्स से ऑप्शंस की तरफ जाने की एक वजह एसटीटी में लगातार इजाफा है। पिछले कुछ सालों में फ्यूचर्स पर एसटीटी बढ़ा है।
फ्यूचर्स ट्रेडिंग के लिए अब ज्यादा मार्जिन जरूरी
उन्होंने बड़े कॉन्ट्रैक्ट साइज को भी एक वजह बताया। इससे फ्यूचर्स ट्रेडिंग और ऑप्शंस सेलिंग के लिए अब ज्यादा मार्जिन की जरूरत पड़ती है। उन्होंने कहा कि ऑप्शंस खरीदने के लिए प्रीमियम चुकाना पड़ता है, जिससे शुरुआत में कम पूंजी की जरूरत पड़ती है। खरीदे गए ऑप्शंस पर उतना ही लॉस होगा, जितना प्रीमियम चुकाया गया है। लेकिन, निश्चित समय में बार-बार ऑप्शंस खरीदने से फ्यूचर्स में ट्रेडिंग या ऑप्शंस सेलिंग के मुकाबले ज्यादा लॉस हो सकता है।
फ्यूचर्स ट्रेडिंग और ऑप्शन सेलिंग में काफी रिस्क
कामत ने स्पष्ट किया कि प्यूचर्स ट्रेडिंग और ऑप्शंस सेलिंग कम रिस्क वाली स्ट्रेटेजीज नहीं हैं। उन्होंने वीकली एक्सपायरीज में ग्रोथ का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि काफी संख्या में ट्रेडर्स ने मंथली कॉन्ट्रैक्ट्स की जगह छोटी अवधि में कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव लगाने शुरू किए हैं। इसमें जीरो-डे-टू-एक्सपायरी ऑप्शंस भी शामिल हैं।
एमटीएफ में ब्रोकर्स इनवेस्टर्स को कर्ज देते हैं
MTF में इनवेस्टर्स एलिजिबल शेयर्स खरीदने के लिए ब्रोकर्स से कर्ज लेते हैं। इसमें शेयर कौलैटरल का काम करते हैं। सितंबर के अंत में एमटीएफ के जरिए होने वाले ट्रेड्स 1.59 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गए थे। 23 अक्तूबर को एनएसई की एमटीएफ बुक 1.44 लाख करोड़ और बीएसई की 7,427 करोड़ रुपये थी।
ऐसे काम करता है एमटीएफ का सिस्टम
आउटस्टैंडिंग एमटीएफ बुक में स्मॉलकैप स्टॉक्स की हिस्सेदारी 49 फीसदी, लार्जकैप स्टॉक्स की 31 फीसदी हिस्सेदारी और मिडकैप की 20 फीसदी हिस्सेदारी थी। एमटीएफ में इनवेस्टर को शेयर की पर्चेज वैल्यू का सिर्फ एक हिस्सा चुकाना होता है। बाकी पैसा वह ब्रोकर्स से उधार लेता है। इस पैसे पर वह इंटरेस्ट चुकाता है। शेयर कोलैटरल का काम करते हैं।