जीरोधा के को-फाउंडर और सीईओ नितिन कामत ने कहा है कि स्टॉक ट्रेडिंग को आसान बनाने में सेबी की कोशिशों का बड़ा हाथ है। उनका यह भी मानना है कि इसका सबसे ज्यादा फायदा रिटेल ट्रेडर्स को मिला है। कामत ने इस बारे में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट किया है। इसमें उन्होंने बताया है कि ज्यादातर लोगों के ब्रोकरेज फर्मों के बिजनेस से जुड़ी जटिलताओं के बारे में पता नहीं होता। शेयर ट्रेडिंग के पीछे एक मुश्किल प्रोसेस होता है। उन्होंने बताया है कि कैसे सेबी की कोशिशों की वजह से यह प्रोसेस पहले के मुकाबले आसान हुआ है।
प्रोसेस के लिए सेबी ने तय किए स्टैंडर्ड
Nithin Kamath ने इस बारे में हाल में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट किया है। इसमें उन्होंने कहा है कि शेयर से जुड़े ट्रेड के पीछ ब्रोकरेज फर्म का एक जटिल सिस्टम काम करता है। इसमें स्टॉक एक्सचेंज, डिपॉजिटरीज, आरटीए, बैंक आदि शामिल होते हैं। पहले यह इंटिग्रेशन अलग-अलग तरह से होता था यानी इसके लिए कोई यूनिफॉर्म और एक जैसा स्टैंडर्ड तय नहीं था। इस वजह से पूरा प्रोसेस काफी जटिल हो जाता था। सैकड़ों एपीआई और फाइल्स का एक्सचेंज होता था। इन चीजों के बारे में ब्रोकरेज फर्मों के क्लाइंट्स को पता नहीं चलता है।
ऑपरेशन से जुड़ी जटिलता कम हुई
उन्होंने कहा कि सेबी की कोशिशों से यह प्रोसेस अब काफी आसान हो गया है। इसके पीछे कई सालों की मेहनत है। उन्होंने एक उदाहरण दिया, जिसमें सेबी ने अलग-अलग मार्केट एनटिटीज के बीच डेटा के एक्सचेंज के लिए एक स्टैंडर्ड तय किया था। इसे यूनिफाइड डिस्टिल्ड फाइल फॉरमैट्स (UDiFF) कहा जाता है। इससे एक डेटा जो अलग-अलग तरह से रिप्रजेंट होता था, वह सिंगल फॉरमैट में आ गया। इसका फायदा यह हुआ कि अलग-अलग डेटा फॉरमैट को मेंटेन करने के लिए 60 फीसदी कोड की जरूरत खत्म हो गई। इससे ऑपरेशन से जुड़ी जटिलता कम हुई। साथ में रिस्क भी घट गया।
डेटा इंपोर्ट में अब चुटकी बजाते हो रहा
कामत ने कहा कि इससे क्षमता भी काफी बढ़ गई। डेटा इंपोर्ट करने में पहले लगने वाला 40 मिनट का समय घटकर सिर्फ 30 सेकेंड रह गया। सेबी के इस प्रोजेक्ट से टेक्निकल और ऑपरेशनल रिस्क भी काफी घट गया। पर्दे के पीछ चलने वाली ये कोशिशें दिखती नहीं हैं लेकिन इनका असर काफी व्यापक और बड़ा होता है। इसका सीधा फआयदा रिटेल क्लाइंट्स को होता है। उन्होंने बताया कि जीरोधा लगातार टेक्निकल और ऑपरेशनल इम्प्रूवमेंट्स की कोशिश करती रहती है। कंपनी अगली तिमाही की जगह अगले दशक को ध्यान में रख काम करती है।