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चिराग पासवान: पार्टी तो हाथ से फिसल गई लेकिन क्या मतदाता भी बहक जाएंगे

चिराग पासवान के पास भले ही अब पार्टी नहीं है लेकिन पिता की विरासत के दावेदार वह हमेशा रहेंगे, अब इंतजार इस बात का है कि वो कितने दमदार तरीके से अपना दावा जता पाते हैं
अपडेटेड Jun 18, 2021 पर 16:02  |  स्रोत : Moneycontrol.com

चंदन श्रीवास्तव


चलन तो यही रहा है कि चुनाव सामने हो तो सांसद अपने आगे की सोच रातो-रात पार्टी बदल लेते हैं। लेकिन बिहार में इसका उल्टा हुआ। सूबे में कोई चुनाव तो अभी नहीं है लेकिन कुछ सांसदों ने पार्टी बदलने की जगह अपनी पार्टी का नेता बदल लिया है।


जून के पहले पखवाड़े तक लोक जनशक्ति पार्टी(लोजपा) के सर्वमान्य नेता और राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान थे मगर जून के दूसरे पखवाड़े में लोजपा के सांसदों के सर्वमान्य नेता उनके चाचा पशुपति पारस हैं।


पार्टी और परिवार


और, पार्टी का नेता बदलने का यह खेल बड़े ड्रामाई अंदाज में हुआ। सो, कहना मुश्किल है कि पार्टी ने अपना नेता बदला है या परिवार ने अपना मुखिया बदला है। भारत की निराली लोकतांत्रिक राजनीति के स्वभाव की अपनी समझ के हिसाब से आप परिवार को पार्टी मानकर बरत सकते हैं या फिर पार्टी को ही अपना परिवार मान सकते हैं।


मिसाल के लिए, गौर करें कि पार्टी में कुल छह सांसद थे। इन छह सांसदों में तीन का आपस में रिश्ता चाचा-भतीजे का था। एक भतीजे यानि चिराग पासवान के जिम्मे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद था तो दूसरे भतीजे प्रिंस राज( रामविलास पासवान के भाई रामचंद्र पासवान के पुत्र) के पास पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष का पद।


चाचा पशुपति कुमार पारस के हाथ में पार्टी का कुछ भी नहीं था, सिर्फ एक सांसदी बची रह गई थी मानो वे परिवारनुमा पार्टी में पुरानी पीढ़ी के प्रतिनिधि हों जिसका काम अब बस इतना भर रह गया हो कि वह परिवार की नई पीढ़ी के सूरज को चढ़ते और बढ़ते देखे।


लेकिन, फिर चाचा ने अपनी इस नियति को मानने से इनकार कर दिया। परिवार के चाचा के पास हाजीपुर से सांसदी के अतिरिक्त 1977 से चला आ रहा राजनीति का जमीनी अनुभव था और इससे भी अहम एक बात ये थी कि उन्हें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की दोस्ती हासिल थी।


फिर यों हुआ कि चाचा ने अपने दो भतीजों में से एक(प्रिंस राज, समस्तीपुर के सांसद) को अपने साथ कर लिया। चाचा-भतीजे के इस जोड़ी को लगा कि परिवार का मुखिया बदलना जरुरी है और मुखिया बदलने की वे जो कवायद करने जा रहे हैं उसका लोकतांत्रिक लगना जरुरी है।


सो, दोनों ने पार्टी की तरफ से खगड़िया से सांसद महबूब अली कैसर, वैशाली से सांसद वीणा देवी, और नवादा से सांसद चंदन सिंह को साथ लिया। कुछ छह सांसदों की पार्टी में इस तरह पांच सांसदों ने पार्टी के संस्थापक स्व.रामविलास पासवान के पुत्र चिराग पासवान यानि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को एक किनारे कर दिया।


पांच सांसदों ने तय किया कि छठे सांसद की अध्यक्षता उन्हें कबूल नहीं। चिराग पासवान पर आरोप ये लगा कि उन्होंने पार्टी को उसके समर्थक से दूर किया है, बिहार विधानसभा के चुनाव के वक्त गलत फैसला (एनडीए से अलग होने का) लिया।   


इस गलत फैसले की सजा की तजवीज के तौर पर पांच सांसदों ने तय किया कि छठे सांसद यानि पार्टी के अध्यक्ष को उसकी पार्टी से ही अलग कर दिया जाये। सो, पांच सांसदों ने लोकसभा के स्पीकर ओम बिड़ला को चिट्ठी लिखी कि सदन में दल के नेता पशुपति पारस होंगे। इस फैसले पर मुहर लगने के साथ लोजपा के पार्टी अध्यक्ष का पार्टी से अलगाव फाइनल मान लिया गया।


मुहावरे का फर्क


पार्टी टूटी है या परिवार टूटा है ? पार्टी का अध्यक्ष बदला है या लोकसभा में पार्टी के विधायक दल का नेता बदला है ? लोजपा के बारे में ये सवाल अलग-अलग नहीं बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आप दावे के साथ बस इतना भर कह सकते हैं कि लोजपा में तख्तापलट तो हुआ है लेकिन इस तख्तापलट को जायज और नाजायज ठहराने के लिए दो अलग किस्म के मुहावरे का इस्तेमाल हो रहा है।


पार्टी से उसके अध्यक्ष को अलग करने की अपनी कवायद को जायज ठहराते हुए पशुपति  पारस ने कहा कि पार्टी नेतृत्व जन-भावनाओं को समझने में नाकाम रहा। बिहार विधानसभा के चुनाव के वक्त लोजपा ने एनडीए से अलग चुनाव लड़ने का गलत फैसला किया। सो, उनका तर्क कहता है कि तख्तापलट हुआ है तो इसलिए कि पार्टी फिर से अपने कार्यकर्ताओं से जुड़ जाये।


लोकसभा में पार्टी की कमान संभालने के अपने फैसले को जायज ठहराते हुए उन्होंने कहा कि कुछ असामाजिक तत्वों ने पार्टी(लोजपा) में सेंधमारी की और 99 फीसदी कार्यकर्ताओं की भावना की अनदेखी करते हुए गठबंधन(एनडीए) को तोड़ दिया। बिहार में एनडीए गठबंधन कमजोर हुआ और लोक जनशक्ति पार्टी बिलकुल समाप्ति के कगार पर पहुंच गयी।


पशुपति पारस के मुताबिक ‘पिछले छह महीने से उनकी पार्टी के पाँचों सांसदों की इच्छा थी कि पार्टी को बचा लिया जाए। सो उन्होंने पार्टी को तोड़ा नहीं, बचाया है।’


लेकिन चिराग पासवान तख्तापलट को अलग मुहावरे में सोच रहे हैं। उन्हें लगता है कि उनके साथ परिवार-जन ने विश्वासघात किया है, पार्टी में भितरघात हुआ है और इस भितरघात की पटकथा नीतीश कुमार के इशारे पर लिखी गई है।   


चिराग पासवान पार्टी में हुए तख्तापलट के वाकये को पारिवारिक भावनाओं के धरातल पर समझने और सहने की कोशिश कर रहे हैं। वे कभी कहते हैं, ‘पिता के खोने का दुख सहा है, पार्टी के सांसदों के ना रहने का दुख उससे छोटा है और इस दुख को भी सह लूंगा’ तो कभी यह भी कि ‘पिता के स्वर्गवासी होने पर अनाथ नहीं हुआ था लेकिन आज(पार्टी के टूटने पर) सचमुच अनाथ हो गया। ’


किसी फिल्म के नायक के मुंह से ऐसे संवाद जंचते हैं लेकिन फिल्मों की एक्टिंग छोड़कर राजनीति के मैदान में आये चिराग पासवान के सामने अभी अपनी पिता की विरासत और अपने राजनीतिक करिअर को बचाने की जरुरत आन खड़ी है। आप कह सकते हैं, चिराग पासवान के सामने अभी अस्तित्व को बचाये रखने का संकट है और यह वक्त उनसे इमोशन से उबरकर एक्शन की मांग कर रहा है।


क्या होगा आगे का रास्ता?


चिराग पासवान के पास फिलहाल अपनी पार्टी नहीं। पार्टी उनके पास आएगी इसकी कोई संभावना भी दूर-दूर तक नहीं दिखती क्योंकि दो फाड़ होने के तुरंत बाद पशुपति पारस ने अपनी मंशा जाहिर कर दी कि पार्टी बिहार में एनडीए गठबंधन में लौट सकती है।


पार्टी बचाने के लिए या कह लें पार्टी के पशुपति कुमार वाले धड़े के आगे रोड़े खड़ा करने के लिए चिराग पासवान तकनीकी नुक्तों का सहारा ले सकते हैं लेकिन ये नुक्ते बहुत कारगर साबित नहीं होते। फिलहाल चिराग पासवान इसी रास्ते पर चल रहे हैं।


मिसाल के लिए, हाल के प्रेस कांफ्रेस में उनका ये कहना कि लोकसभा या विधानसभा में नेता का चयन पार्टी संविधान के मुताबिक संसदीय बोर्ड या पार्टी अध्यक्ष कर सकता है। इस नाते वे(चिराग पासवान) लोकसभा के स्पीकर को लिख रहे हैं कि पशुपति पारस को सदन में पार्टी(लोजपा) का नेता मानने के अपने फैसले पर पुनर्विचार करें।


तकनीकी नुक्तों वाला ऐसा ही तर्क उन्होंने पार्टी के अध्यक्ष पद के बारे में भी दिया। प्रेस कांफ्रेस में उन्होंने कहा कि पार्टी संविधान के मुताबिक, राष्ट्रीय अध्यक्ष केवल तभी हटाया जा सकता है, जब उसकी मृत्यु हो जाती है या इस्तीफा देता है। इस तर्क पर आगे बढ़ते हुए वे चुनाव-आयोग में भी गुहार लगा सकते हैं।


इन तकनीकी नुक्तों में दम हो सकता है लेकिन चिराग पासवान को समझना होगा कि राजनीति और वकालत में फर्क होता है। राजनीतिक नेतृत्व अपनी पैरवी नहीं करता बल्कि फैसले लेता है और अपने फैसले को जायज ठहराने के लिए जन-समर्थन जुटाता है। जन-समर्थन जुट जाये तो ऐसी भी स्थिति आती है कि राजनेता का फैसला ही कानून के मानिन्द बरता जाये।


चिराग पासवान के पास भले पार्टी ना रह गई हो लेकिन पिता की विरासत के दावेदार होने का तर्क उनके हाथ से कोई नहीं छिन सकता। बिहार से कांग्रेस के दबदबे के खात्मे के बाद सूबे में राजनीति तीन बड़े चेहरे- लालू यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान के इर्द-गिर्द घूमी।


लालू यादव और नीतीश कुमार ने  जन-समर्थन का अपना आधार मुख्य रुप से अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं के बीच बनाया जबकि रामविलास पासवान ने इसके बरक्स एक सीमित मगर सतत निष्ठावान दलित मतदाताओं का आधार चुना।     


बिहार के मतदाताओं में कुल छह प्रतिशत की तादाद वाले पासवान मतदाताओं की अपने नेता के प्रति यह अटूट निष्ठा ही थी कि रामविलास पासवान बारंबार केंद्रीय मंत्रिमंडल में रहे और बिहार की राजनीति में एक वक्त (2005) ऐसा भी आया जब उनके समर्थन के बिना ना लालू यादव की पार्टी सरकार बना सकती थी, ना ही नीतीश कुमार की पार्टी।


चिराग पासवान के पास पिता के हाथों से हासिल निष्ठावान दलित मतदाताओं की यह पूंजी बनी हुई है। रामविलास पासवान ने उन्हें पार्टी का अध्यक्ष बनाकर मतदाताओं के सामने जाहिर कर दिया था कि पार्टी के भविष्य वे किसके हाथ में सुरक्षित देख रहे हैं।


रामविलास पासवान के जीवित रहते उनके दोनों भाई (पशुपति पारस और रामचंद्र पासवान) उनकी छाया बनकर रहे, राजनीति में अपना खुद का कोई कद कायम नहीं कर पाये। सो, निष्ठावान दलित मतदाताओं को ये स्पष्ट है कि लोजपा का असली वारिस कौन हो सकता है।


चिराग के पक्ष में एक स्थिति ये भी है कि लोजपा का मुख्य समर्थक आधार(पासवान जाति) नीतीश कुमार की राजनीति को पसंद नहीं करता। दलितों के बीच महादलित की कोटि कायम करने की नीतीश कुमार की पहल को वह अपने हितों के विपरीत पाता है। पारस नीतीश कुमार की पार्टी के साथ होने की अपनी मंशा का ऐलान कर चुके हैं तो ये बात लोजपा के समर्थक मतदाताओं को निश्चित ही नहीं सुहायी होगी।


चिराग पासवान अपने निष्ठावान मतदाताओं के भरोसे आगे की राह तलाश सकते हैं। इसमें सहारा बन सकती है पिता की अपनायी शैली। चिराग पासवान के पिता ने कभी मुखर विरोध की राजनीति नहीं की। उनकी शैली ज्यादातर वक्तों में पार्टी के भीतर और बाहर अंतर्विरोधी धाराओं को साथ लेकर चलने या फिर उसके साथ मिलकर आगे बढ़ने की रही।


चिराग की जरुरत मुखर विरोध की अपनी पिछली राजनीति (बिहार चुनाव) से उबरकर निष्ठावान मतदाताओं के बीच पिता की विरासत पर दावा जताने की है। हां, इसके लिए उन्हें सही वक्त का इंतजार करना होगा।


(लेखक सामाजिक-सांस्कृतिक स्कॉलर हैं)


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