ट्रंप टैरिफ के बदले भारत ने यहां कर दिया बड़ा खेल, कम किया अमेरिकी ट्रेजरी बिल की खरीद

यह गिरावट ऐसे समय में हुई है, जब अमेरिकी बॉन्ड बाज़ार में रिटर्न (यील्ड) काफी आकर्षक था। इस दौरान 10 साल की अमेरिकी ट्रेजरी पर यील्ड करीब 4.0 से 4.8 प्रतिशत के बीच रही, जो आम तौर पर विदेशी निवेशकों को निवेश के लिए आकर्षित करती है

अपडेटेड Jan 09, 2026 पर 6:54 PM
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2025 में अमेरिकी ट्रेजरी में भारत की हिस्सेदारी 21% कम हुई

भारत, अमेरिका से चल रहे टैरिफ तनाव के बीच देश की इकोनॉमी को और मजबूत करने के लिए लगातार बड़े कदम उठा रहा है। वही पिछले एक साल में भारत ने अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में अपना निवेश काफी कम कर दिया है। यह कदम दिखाता है कि वैश्विक आर्थिक और जियोपॉलिटिकल टेंशन के बीच भारत अपनी  फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व की रणनीति में धीरे-धीरे बदलाव कर रहा है। अब भारत ज़्यादा डाइवर्सिफिकेशन यानी अलग-अलग जगह निवेश पर जोर दे रहा है।

भारत की हिस्सेदारी 21% हुई कम

ब्लूमबर्ग के आंकड़ों के अनुसार, 31 अक्टूबर 2024 से 31 अक्टूबर 2025 के बीच भारत की अमेरिकी ट्रेजरी नोट्स में हिस्सेदारी करीब 21 प्रतिशत घट गई। यह निवेश 241.4 अरब डॉलर से कम होकर 190.7 अरब डॉलर रह गयापिछले चार सालों में यह पहली बार है जब भारत के अमेरिकी ट्रेजरी निवेश में सालाना गिरावट दर्ज की गई है। इससे पहले के वर्षों में यह निवेश या तो बढ़ रहा था या लगभग स्थिर बना हुआ था

भारत की बदली रणनीति

यह गिरावट ऐसे समय में हुई है, जब अमेरिकी बॉन्ड बाज़ार में रिटर्न (यील्ड) काफी आकर्षक था। इस दौरान 10 साल की अमेरिकी ट्रेजरी पर यील्ड करीब 4.0 से 4.8 प्रतिशत के बीच रही, जो आम तौर पर विदेशी निवेशकों को निवेश के लिए आकर्षित करती है। इसके बावजूद भारत ने अपनी होल्डिंग कम की। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इसकी वजह सिर्फ यील्ड नहीं है, बल्कि भारत की फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व को लेकर बदली हुई रणनीति है। यानी भारत अब अपने रिजर्व को अलग-अलग जगहों पर बांटने (डाइवर्सिफिकेशन) पर ज़्यादा ध्यान दे रहा है।


बैंक ऑफ बड़ौदा की अर्थशास्त्री दीपान्विता मजूमदार ने कहा कि यह कदम दिखाता है कि भारत अपने निवेश को ज्यादा फैलाने की दिशा में सोच रहा है। उनके अनुसार, यह भारत की फॉरेक्स रणनीति में एक साफ बदलाव का संकेत है।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

एक्सपर्ट्स का कहना है कि अमेरिकी ट्रेजरी में भारत का कम निवेश यह भी दिखाता है कि अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घट रही है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि US डॉलर इंडेक्स (DXY) में हाल के समय में कमजोरी देखने को मिल रही है। इसकी एक बड़ी वजह अमेरिका में नौकरी बाजार के कमजोर होने के संकेत बताए जा रहे हैं। डॉलर के आगे और कमजोर होने की उम्मीद, साथ ही अमेरिकी फेडरल रिज़र्व द्वारा भविष्य में ब्याज दरों में नरमी की संभावना, लंबे समय के डॉलर से जुड़े निवेश को कम आकर्षक बना सकती है। इसके अलावा, दुनिया भर में बढ़ते जियोपॉलिटिकल तनाव और व्यापार व वित्तीय लेन-देन में बिखराव के चलते भारतीय रिज़र्व बैंक सहित कई केंद्रीय बैंक अपने फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व की संरचना पर दोबारा विचार कर रहे हैं।

दूसरे विकल्पों की ओर देख रहा भारत

मार्केट के जानकारों का मानना है कि भारत अपने फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व का कुछ हिस्सा अब दूसरे विकल्पों में लगा रहा है। इनमें सोना, दूसरे देशों के सरकारी बॉन्ड और डॉलर के अलावा दूसरी मुद्राएं शामिल हो सकती हैं। खास तौर पर, सोना एक बार फिर दुनिया भर में एक सुरक्षित रिजर्व एसेट के रूप में अहम बन गया है। इसकी वजह यह है कि सोना मुद्रा में उतार-चढ़ाव, महंगाई के खतरे और वैश्विक राजनीतिक तनाव के समय सुरक्षा देता है। अर्थशास्त्री दीपान्विता मजूमदार ने कहा कि मौजूदा अस्थिर वैश्विक राजनीतिक माहौल को देखते हुए भारतीय रिज़र्व बैंक अपने सोने के भंडार में फिर से बढ़ोतरी कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि यह कदम दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों के उस रुझान के अनुरूप होगा, जिसमें वे अपने सोने के भंडार को बढ़ा रहे हैं।

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