Get App

RBI के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव ने कहा, प्राइवेटाइजेशन से सरकारी बैंकों की क्षमता बढ़ेगी, लेकिन सोशल ऑब्जेक्टिव्स पर असर पड़ेगा

सुब्बाराव ने कहा कि प्राइवेट बैंकों का फोकस मुनाफे कमाने पर होता है, जबकि सरकारी बैंकों का फोकस सामाजिक योजनाओं पर होता है। इस वजह से मुनाफा कमाने के मामले में वे पिछड़ जाते हैं

MoneyControl Newsअपडेटेड Sep 01, 2022 पर 9:58 AM
RBI के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव ने कहा, प्राइवेटाइजेशन से सरकारी बैंकों की क्षमता बढ़ेगी, लेकिन सोशल ऑब्जेक्टिव्स पर असर पड़ेगा
RBI के पूर्व गवर्नर D Subbarao ने कहा कि सरकारी बैंकों ने सोशल ऑब्जेक्टिव्स पूरा करने में बड़ी भूमिका निभाई है। लेकिन, अब आगे बढ़ने का समय आ गया है।

Bank Privatisation पर पिछले महीने RBI की एक रिपोर्ट आई थी। इसमें कहा गया था कि सरकारी बैंकों के प्राइवेटाइजेशन से फायदा कम नुकसान ज्यादा होगा। इसमें यह भी कहा गया था कि फाइनेंशियल क्लूजन (Financial Inclusion) जैसे सोशल ऑब्जेक्टिव्स के मामले में सरकारी बैंकों का रिकॉर्ड प्राइवेट बैंकों से अच्छा है। इस रिपोर्ट के बाद बैंकों के निजीकरण को लेकर नई बहस शुरू हो गई। अब RBI के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव (D Subbarao) ने इस बारे में अपनी राय रखी है।

सुब्बाराव ने कहा कि प्राइवेट बैंकों का फोकस मुनाफे कमाने पर होता है, जबकि सरकारी बैंकों का फोकस सामाजिक योजनाओं पर होता है। इस वजह से मुनाफा कमाने के मामले में वे पिछड़ जाते हैं। सरकारी बैंकों के निजीकरण से बैंकिंग सिस्टम की क्षमता तो बढ़ेगी, लेकिन फाइनेंशियल इनक्लूजन और छोटे उद्यमों को लोन देने जैसे सोशल ऑब्जेक्टिव पर असर पड़ सकता है।

यह भी पढ़ें : Petrol Diesel Price: आज सिलेंडर हुआ सस्ता, क्या पेट्रोल-डीजल का रेट भी हुआ कम? यहां चेक करें दाम

उन्होंने कहा कि सरकारी बैंकों ने सोशल ऑब्जेक्टिव्स पूरे करने में बड़ी भूमिका निभाई है। लेकिन, अब आगे बढ़ने का समय आ गया है। हमें सोशल ऑब्जेक्टिव्स के लिए बैंकों के डिपॉजिटर्स और बॉरोअर्स पर बोझ डालने के बजाय दूसरे इंस्ट्रूमेंट्स का इस्तेमाल करना चाहिए। प्राइवेटाइजेशन को लेकर आक्रमक रुख अपनाने की जरूरत नहीं है। लेकिन, इस मसले को लंबे समय तक टाला नहीं जा सकता। हमें इसके लिए एक रोडमैप बनाना चाहिए। हम सरकारी बैंकों ने निजीकरण के लिए 10 साल का समय तय कर सकते हैं।

सब समाचार

+ और भी पढ़ें