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चाहे आपको घर खरीदने के लिए लोन लेना हो या किसी और काम के लिए, बढ़ती ब्याज दरों को देखते हुए कुछ बातें ध्यान रखना जरूरी है।
ईएमआई (मासिक किश्त)
लेनदार को हर महीने चुकाई जाने वाली तय रकम को ईएमआई या मासिक किश्त कहते हैं। ईएमआई के दो हिस्से होते हैं - लोन ली गई पूंजी का हिस्सा और लोन पर लगाए गए ब्याज का हिस्सा।
ध्यान में रखने की बात है कि लोन लेने की शुरुआती ईएमआई में ब्याज का हिस्सा ज्यादा होता है। जैसे 10 साल के लोन पर आपने 5 साल तक ईएमआई भरी है। इसका मतलब नहीं है कि आपने अपना आधा लोन चुकता दिया है।
हर चुकाई गई ईएमआई के साथ ब्याज का हिस्सा कम होता जाता है और लोन की रकम का ज्यादा। ज्यादा लंबी अवधि के लोन पर हर महीने ज्यादा ब्याज चुकाना पड़ता है।
ईएमआई और वेतन
आपकी मासिक आय, काबिलियत, किस कंपनी में नौकरी करते हैं या कारोबार, नौकरी के साल, अन्य आय, नौकरी बदलने की क्षमता और योग्यता जैसे पहलुओं को देखते हुए बैंक या फाइनेंस कंपनी आपको कितना लोन दिया जा सकता है ये तय करती है।
साथ ही, ईएमआई हमेशा मासिक वेतन के 30-40 फीसदी से ज्यादा नहीं तय की जाती है। ईएमआई तय करते वक्त बैंक या फाइनेंस कंपनी आपकी मासिक आय को हिस्सों में बांटती है।
पहला 10 फीसदी हिस्सा दूसरे लोन के भुगतान के लिए छोड़ा जाता है। 20-25 फीसदी हिस्सा अनिवार्य निवेश के लिए छोड़ा जाता है। 20-25 फीसदी हिस्सा मासिक खर्चों के लिए छोड़ा जाता है। वेतन के बाकी बचे 30-40 फीसदी हिस्से को ईएमआई बनाया जाता है। व्यवसायियों के लिए मुनाफा ईएमआई तय करने का आधार होता है।
कुछ जरूरी टिप्स
- जितनी लंबी लोन की अवधि होती है, उतनी कम ईएमआई। इसलिए लंबी अवधि के लिए ज्यादा लोन लिया जा सकता है।
- लोन लेते वक्त ईएमआई को जरूर देखें। ईएमआई के साथ-साथ बाकी खर्चे पूरे करने के लिए पैसे बचना जरूरी हैं।
- भविष्य के खर्चों को भी ध्यान में रखें, जैसे बच्चों की पढ़ाई, रिटायमेंट फंड
- वेतन बढ़ने पर या कहीं और से पैसे मिलने पर लोन को चुकाने के बारे में सोचें।
(यह लेख बैंकबाजार डॉट कॉम से साभार लिया गया है।)
