Cheque Bounce Rules: क्या चेक बाउंस होने पर हो सकती है जेल? जानिए क्या कहता है कानून

Cheque Bounce Rules: चेक बाउंस होना सिर्फ बैंकिंग समस्या नहीं है। कुछ मामलों में इसके कारण कानूनी कार्रवाई, जुर्माना और जेल तक हो सकती है। जानिए चेक बाउंस पर कौन से नियम लागू होते हैं, धारा 138 क्या कहती है और किन मामलों में सजा हो सकती है।

अपडेटेड Jun 02, 2026 पर 10:47 PM
चेक देने से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि खाते में पर्याप्त रकम मौजूद है।

Cheque Bounce Rules: आज भी बड़ी संख्या में लोग लेनदेन के लिए चेक का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन अगर किसी कारण से चेक बाउंस हो जाए, मामला सिर्फ बैंकिंग गलती तक सीमित नहीं रहता। कई मामलों में चेक बाउंस होने पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है। यही वजह है कि चेक जारी करने से पहले उसके नियम और इससे जुड़े कानून को समझना जरूरी है।

चेक बाउंस क्या होता है?

चेक बाउंस तब होता है जब बैंक किसी चेक का भुगतान करने से मना कर देता है। इसकी सबसे आम वजह खाते में पर्याप्त पैसा न होना है। हालांकि गलत हस्ताक्षर, खाते से जुड़ी तकनीकी समस्या या अन्य कारणों से भी चेक पास नहीं हो सकता।


कानून क्या कहता है?

भारत में चेक बाउंस के मामलों को नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत देखा जाता है। यह कानून इसलिए बनाया गया है ताकि लोग चेक के जरिए होने वाले लेनदेन पर भरोसा कर सकें और धोखाधड़ी की घटनाओं को रोका जा सके।

हालांकि हर चेक बाउंस का मामला अपराध नहीं माना जाता। इसके लिए कुछ शर्तों का पूरा होना जरूरी है।

किन मामलों में लागू होती है धारा 138?

धारा 138 तब लागू होती है जब चेक किसी कर्ज, उधार या किसी बकाया रकम के भुगतान के लिए दिया गया हो और वह बाउंस हो जाए।

इसके अलावा चेक उसकी वैधता अवधि के भीतर बैंक में लगाया गया होना चाहिए। अगर खाते में पर्याप्त पैसा नहीं है या किसी ऐसी वजह से भुगतान नहीं हो पाता जो चेक जारी करने वाले व्यक्ति से जुड़ी है, तो मामला धारा 138 के दायरे में आ सकता है।

चेक बाउंस होने के बाद क्या होता है?

अगर चेक बाउंस हो जाता है, तो जिस व्यक्ति को पैसे मिलने थे उसे बैंक से जानकारी मिलने के 30 दिनों के भीतर चेक जारी करने वाले व्यक्ति को लिखित नोटिस भेजना होता है।

नोटिस मिलने के बाद चेक जारी करने वाले व्यक्ति के पास भुगतान करने के लिए 15 दिन का समय होता है। अगर वह इस दौरान पैसे नहीं चुकाता, तो मामला अदालत तक पहुंच सकता है।

क्या हो सकती है सजा?

अगर अदालत में आरोप साबित हो जाते हैं, तो चेक जारी करने वाले व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई हो सकती है।

दोषी पाए जाने पर अधिकतम दो साल तक की जेल हो सकती है। इसके अलावा चेक की रकम के दोगुने तक जुर्माना भी लगाया जा सकता है। अदालत चाहे तो जेल और जुर्माना दोनों सजा एक साथ दे सकती है।

किन मामलों में यह कानून लागू नहीं होता?

धारा 138 केवल उन्हीं मामलों में लागू होती है जहां चेक किसी कर्ज, उधार या कानूनी भुगतान के लिए दिया गया हो।

अगर किसी ने उपहार के तौर पर चेक दिया था या दोनों पक्षों के बीच कोई वित्तीय देनदारी ही नहीं थी, तो यह धारा लागू नहीं हो सकती। इसी तरह कुछ तकनीकी कारणों से चेक पास न होने पर हर मामले को आपराधिक अपराध नहीं माना जाता। अंतिम फैसला हर मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाता है।

चेक जारी करते समय क्या सावधानी रखें?

चेक देने से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि खाते में पर्याप्त रकम मौजूद है। साथ ही तारीख, राशि, नाम और हस्ताक्षर जैसी सभी जानकारियां सही हों।

छोटी सी गलती भी बाद में कानूनी विवाद की वजह बन सकती है।

कानून की जानकारी क्यों जरूरी है?

कई लोग जानकारी के अभाव में ऐसी गलतियां कर बैठते हैं जिनकी वजह से उन्हें अदालत के चक्कर लगाने पड़ सकते हैं। इसलिए चेक जारी करने से पहले नियमों को समझना जरूरी है। थोड़ी सावधानी आपको कानूनी परेशानी और आर्थिक नुकसान दोनों से बचा सकती है।

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