देश में अगले साल मिनिमम वेज (Minimum Wage) की जगह लिविंग वेज (Living Wage) लागू हो सकता है। सरकार ने इस बारे में इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन (ILO) से तकनीकी मदद मांगी है। लिविंग वेज का अनुमान लगाने और इसे लागू करने के लिए एक फ्रेमवर्क की जरूरत पड़ेगी। इस महीने की शुरुआत में ILO ने लिविंग वेज का कॉनसेप्ट पेश किया था। इससे पहले मिनिमम वेज की जगह लिविंग वेज को लागू करने के एग्रीमेंट पर सहमति बनी थी। यह सहमति फरवरी में बनी थी, जब वेज पॉलिसीज पर एक्सपर्ट्स की एक मीटिंग हुई थी। ILO की गवर्निंग बॉडी ने 13 मार्च को अपने सेशन में इस पर मुहर लगा दी थी। एक सीनियर अफसर ने इकोनॉमिक टाइम्स को बताया कि एक साल के अंदर मिनिमम वेज की व्यवस्था बदल जाएगी।
इंडिया में काम करने वाले करीब 50 करोड़ लोग
इंडिया में 50 करोड़ से ज्यादा वर्कर्स हैं। इसमें से 90 फीसदी असंगठित क्षेत्र में हैं। इनमें से कई को रोजाना 176 रुपये या इससे ज्यादा मजदूरी मिलती है। यह अमाउंट इस पर निर्भर करता है कि व्यक्ति किस राज्य में है। 2017 से नेशनल वेज की न्यूनतम सीमा में बदलाव नहीं हुआ है। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग मिनिमम वेज लागू है। इंडिया 1922 से ILO की गवर्निंग बॉडी का स्थायी सदस्य है। यह आईएलओ का फाउंडिंग मेंबर भी है।
वेजेज का नया कानून अभी लागू नहीं
सरकार ने 2019 में वेजेज का नया कानून 2019 में पारित कर दिया था। लेकिन, अब तक इसे लागू नहीं किया गया है। इसमें एक जैसे वेजेज का प्रावधान है, जो सभी राज्यों में एक साथ लागू होगा। इंडिया 20230 तक सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल (SDGs) हासिल करने को लेकर प्रतिबद्ध है। बताया जाता है कि मिनिमम वेजेज की जगह लिविंग वेजेज का सिस्टम लागू करने से करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने में मदद मिलेगी। साथ ही लोगों की लाइफ स्टाइल भी बेहतर होगी।
एक अधिकारी ने बताया कि लिविंग वेज को लागू करने में ILO की मदद मांगी गई है। वह नई व्यवस्था लागू करने के लिए कैपेसिटी बिल्डिंग, डेटा के सिस्टमैटिक कलेक्शन और इसके पॉजिटिव आर्थिक नतीजों के मामले में सरकार की मदद करेगा।
मिनिमम वेज का मतलब क्या है?
मिनिमम वेज का मतलब उस न्यूनतम अमाउंट से है, जो एक एंप्लॉयर काम के बदले एंपलॉयी को देता है। यह काम की एक निश्चित अवधि के लिए होता है। इसमें इंडिविजुअल कॉन्ट्रैक्ट या कलेक्टिव एग्रीमेंट के जरिए बदलाव नहीं किया जा सकता। मिनिमम वेज का मकसद यह है कि किसी काम के बदले व्यक्ति को एक सीमा से कम पेमेंट नहीं किया जाए। मिनिमम वेज और लिविंग वेज के कैलकुलेशन के लिए अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल होता है।
इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक, लिविंग वेज किसी काम के बदले किया जाना वाला वह पेमेंट है, जिसमें वर्कर्स और उनके परिवार की अच्छी लाइफ-स्टाइल का ध्यान रखा जाता है। इसके निर्धारण में देश की स्थितियों का ध्यान रखा जाता है। इसका कैलकुलेशन काम के सामान्य घंटों के आधार पर होता है। इसमें फूड, क्लॉदिंग और शेल्टर जैसी जरूरतों का ध्यान रखा जाता है। साथ ही चाइल्ड एजुकेशन औक हेल्थ प्रोटेक्शन जैसे उपाय शामिल होते हैं।
यह भी पढ़ें: India Q3 GDP Data: लोकसभा चुनावों से पहले GDP ने दिखाया दम, दिसंबर तिमाही में GDP ग्रोथ बढ़कर 8.4% रही