Finance Act 2023 में बदलाव के बाद क्या डेट म्यूचुअल फंड्स में निवेश फायदेमंद है?
म्यूचुअल फंड्स की स्कीमों के टैक्स के नियम बदल गए हैं। फाइनेंस बिल 2023 के जरिए यह बदलाव किया गया है। हालांकि. वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी, 2023 को जो बजट पेश किया था, उसमें इस बदलाव का जिक्र नहीं था। इसे फाइनेंस बिल 2023 में बाद में शामिल किया गया
टैक्स नियमों में इस बदलाव से पहले डेट म्यूचुअल फंड्स में तीन साल से ज्यादा पीरियड के निवेश पर इनवेस्टर्स की काफी टैक्स सेविंग्स हो जाती थी। हालांकि, 31 मार्च, 2023 तक किए गए निवेश पर पहले के नियम लागू होंगे।
इनवेस्टमेंट के फैसले लेने से पहले इनवेस्टर्स अक्सर टैक्स के असर का ध्यान रखते हैं। 1 अप्रैल, 2023 से पहले कई इनवेस्टर्स खासकर अमीर निवेशक (HNI कैटेगरी के) म्यूचुअल फंड्स की डेट स्कीमों में इनवेस्ट करने में दिलचस्पी दिखाते थे। इसकी वजह यह थी कि ये टैक्स से लिहाज से फिक्स्ड डिपॉजिट के मुकाबले अट्रैक्टिव दिखती थी। इंडिया में फाइनेंशियल इनवेस्टमेंट्स में निवेश से होने वाले मुनाफे पर कैपिटल गेंस या दूसरे स्रोत (इंटरेस्ट इनकम या डिविडेंड) के तहत टैक्स लगता है। यह इंस्ट्रूमेंट के नेचर पर निर्भर करता है।
कैपिटल गेंस पर टैक्स
इंटरेस्ट इनकम और डिविडेंड पर टैक्स का रेट इनवेस्टर के टैक्स स्लैब के हिसाब से तय होता है। कैपिटल गेंस पर टैक्स शॉर्ट टर्म या लॉन्ग टर्म के आधार पर लगता है। इसका निर्धारण फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट के नेचर और इनवेस्टमेंट के होल्डिंग पीरियड से तय होता है। मार्च 2023 के अंतिम हफ्ते में सरकार के एक फैसले से म्यूचुअल फंड्स के डेट फंडों के इनवेस्टर्स को झटका लगा। सरकार ने 1 अप्रैल, 2023 के बाद इन फंडों में तीन साल से ज्यादा के निवेश पर इंडेक्सेशन का बेनेफिट हटा दिया। इस फैसले ने इनवेस्टर्स को हैरान कर दिया, क्योंकि यह प्रस्ताव 1 फरवरी, 2023 को पेश बजट में शामिल नहीं था। इस अंतिम समय में फाइनेंश बिल 2023 में शामिल किया गया, जिसे बाद में संसद के दोनों सदनों ने पारित कर दिया।
टैक्स नियमों में इस बदलाव से पहले डेट म्यूचुअल फंड्स में तीन साल से ज्यादा पीरियड के निवेश पर इनवेस्टर्स की काफी टैक्स सेविंग्स हो जाती थी। हालांकि, 31 मार्च, 2023 तक किए गए निवेश पर पहले के नियम लागू होंगे। पहले नियम यह था कि डेट फंड्स में तीन साल या इससे ज्यादा पीरियड के निवेश पर हुए कैपिटल गेंस पर इनवेस्टमेंट अमाउंट पर इंडेक्सेशन बेनेफिट के साथ 20 फीसदी टैक्स लगता था। इंडेक्सेशन के बेनेफिट्स की वजह से टैक्स का रेट बहुत कम हो जाता था। हालांकि, यह इनवेस्टमेंट के होल्डिंग पीरियड पर निर्भर करता था। तीन साल से कम के निवेश पर टैक्सपेयर के टैक्स स्लैब के हिसाब से लगता है। इसका मतलब है कि अगर कोई टैक्स पेयर इनकम टैक्स के सबसे ज्यादा स्लैब में आता है तो उसे 30 फीसदी टैक्स चुकाना होगा।
क्या बदलाव आया है?
म्यूचुअल फंड्स की स्कीम के टैक्स नियमों में बदलाव के बाद इक्विटी में 35 फीसदी से कम निवेश वाली स्कीमों में 3 साल या इससे ज्यादा समय तक निवेश पर कम टैक्स का फायदा अब खत्म हो गया है। म्यूचुअल फंड्स की डेट स्कीमें नए नियम के दायरे में आ गई हैं। गोल्ड फंड्स, मल्टी एसेट फंड्स, इंटरनेशनल इक्विटी फंड्स (जिनका इक्विटी में निवेश 35% से कम है) में भी 1 अप्रैल, 2023 या इसके बाद किए गए निवेश पर नया नियम लागू होगा। अब कैपिटल गेंस के लिए होल्डिंग पीरियड का मतलब नहीं रह गया है। ऐसे स्कीमों से होने वाले कैपिटल गेंस को शॉर्ट टर्म कैपिटल गेंस माना जाएगा। इस पर इनवेस्टर के टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स लगेगा। इसे एक चार्ट की मदद से समझा जा सकता है:
कैपिटल गेंस
म्यूचुअल फंड्स की ऐसी स्कीमें जिनका इक्विटी में निवेश 35% तक है
म्यूचुअल फंड्स की ऐसी स्कीमें जिनका इक्विटी में निवेश 36 से 64% के बीच है
म्यूचुअल फंड की ऐसी स्कीमें जिनका इक्विटी में निवेश 65% या इससे ज्यादा है
शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन
आपके स्लैब रेट के मुताबिक
आपके स्लैब रेट के मुताबिक (3 साल से कम)
15% (एक साल से कम)
लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन
आपके स्लैब रेट के मुताबिक
इंडेक्सेशन के साथ 20% (3 साल से अधिक)
1 लाख रुपये से अधिक के गेंस पर 10% (एक साल से ज्यादा)
टैक्स के नियमों में इस बदलाव के बाद डेट ओरिएंटेड म्यूचुअल फंड्स और बॉन्ड्स एवं फिक्स्ड डिपॉजिट्स जैसै फिक्स्ड इनकम के दूसरे प्रोडक्ट्स के बीच टैक्स रेट एक जैसे हो गए हैं। इस वजह से डेट आधारित म्यूचुअल फंड्स की स्कीमों का एक बड़ा अट्रैक्शन खत्म हो गया है। सवाल है कि क्या कोई दूसरा बेनेफिट है जो 1 अप्रैल, 2023 के बाद किए गए इनवेस्टमेंट पर मिलता रहेगा?
अब भी डेट स्कीमों में निवेश फायदेमंद
इस सवाल का जवाब यह है कि डेट म्यूचुअल फंड्स को अब भी एक बड़ा फायदा उपलब्ध है। इनवेस्टर्स टैक्स प्लानिंग के दौरान इसमें निवेश का फैसला कर सकते हैं, क्योंकि डेट म्यूचुअल फंड्स से होने वाली इनकम पर सिर्फ तभी टैक्स लगता है जब इनवेटर्स इस फंड्स की यूनिट्स बेचता है। दूसरी तरफ, फिक्स्ड डिपॉजिट के मामले में इनकम पर ड्यू/ एक्रुअल बेसिस पर टैक्स लगता है। यहां तक कि इनवेस्टर के बैंक अकाउंट में इंटरेस्ट नहीं आने पर भी टैक्स लग जाता है।
इसे एक उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है। मान लीजिए आप ऐसे फिक्स्ड डिपॉजिट में 10 लाख रुपये इनवेस्ट करता है, जिसका इंटरेस्ट रेट सालाना 7 फीसदी है। अगर आपने साल के अंत में अपने बैंक अकाउंट में 70,000 रुपये का इंटरेस्ट अमाउंट प्राप्त नहीं किया है तो भी इस पर आपको टैक्स चुकाना होगा, क्योंकि इंटरेस्ट अमाउंट आपके फिक्स्ड डिपॉजिट बैलेंस में जुड़ता जाता है।
दूसरी तरफ, अगर आपने म्यूचुअल फंड्स की ऐसी डेट स्कीम में निवेस किया है, जिसकी NAV 100 रुपये है और आपको 10,000 यूनिट्स मिलती हैं। मान लीजिए साल के अंत में NAV 7 फीसदी बढ़कर 107 रुपये हो जाती है तो इस मामले में आपको तब तक कोई टैक्स नहीं चुकाना पड़ता जब तक आप इस स्कीम की यूनिटस बेच (रिडीम) नहीं देते। मान लीजिए इनवेस्टर अपनी 50 फीसदी यूनिट्स रिडीम करने का फैसला करता है। ऐसे में 5000 यूनिट्स पर कुल कैपिटल गेंस सिर्फ 35000 रुपये होगा। इसलिए म्यूचुअल फंड्स अब भी टैक्स के लिहाज से फिक्स्ड डिपॉजिट के मुकाबले बेहतर है।
हालांकि, कुछ दूसरे फैक्टर्स भी है, जिनका ध्यान आपको रखना होगा। जैसे फिक्स्ड डिपॉजिट पर आपको फिक्स्ड रिटर्न मिलता है, जबकि म्यूचुअल फंड्स का रिटर्न निवेश करते समय सिर्फ इंडिकेटिव होता है और यह कम या ज्यादा हो सकता है। इकोनॉमी में इंटरेस्ट रेट्स की चाल पर यह निर्भर करता है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि डेट म्यूचुअल फंड्स के दिन अभी लदे नहीं हैं।
(अभिषेक अनेजा सीए हैं। वह पर्सनल फाइनेंस और इनकमट टैक्स से जुड़े मामलों के एक्सपर्ट हैं)