Gold Leasing: भारत में ज्यादातर लोग सोना खरीदकर लॉकर, तिजोरी या घर में रख देते हैं। लेकिन अब कुछ प्लेटफॉर्म ऐसे भी हैं, जो आपको सोना बेचे बिना उससे कमाई करने का मौका देते हैं। इसे गोल्ड लीजिंग कहा जाता है। इसमें आप अपना सोना ज्वैलर्स को तय समय के लिए लीज पर देते हैं। बदले में आपको रिटर्न मिलता है। अच्छी बात यह है कि सोने का मालिकाना हक आपके पास ही रहता है।
गोल्ड लीजिंग में निवेशक अपना सोना निष्क्रिय रखने की बजाय उसे लीज पर देकर कमाई करते हैं। फिनटेक प्लेटफॉर्म निवेशकों और ज्वैलर्स को जोड़ने का काम करते हैं।
ज्वैलर्स इस सोने का इस्तेमाल अपने कारोबार में करते हैं। वे इसे इन्वेंट्री और वर्किंग कैपिटल के रूप में इस्तेमाल करते हैं। इसके बदले निवेशकों को लीज रेंटल मिलता है। यह आमतौर पर अतिरिक्त सोने या तय रिटर्न के रूप में दिया जाता है।
ज्वैलर्स को ज्वेलरी बनाने और बेचने के लिए लगातार सोने की जरूरत होती है। गोल्ड लीजिंग उन्हें बिना बड़ी रकम खर्च किए सोना उपलब्ध कराती है।
इससे उन्हें नया सोना खरीदने या आयात करने की जरूरत कम पड़ती है। उनकी पूंजी की बचत होती है। वे बचा हुआ पैसा कारोबार बढ़ाने और रोजमर्रा के कामों में लगा सकते हैं।
SafeGold के संस्थापक और सीईओ गौरव माथुर के मुताबिक, भारत में करीब 25,000 से 30,000 टन सोना घरों में रखा हुआ है। इसका बड़ा हिस्सा इस्तेमाल नहीं हो रहा। गोल्ड लीजिंग इस सोने को अर्थव्यवस्था में शामिल करने का एक तरीका है।
निवेशकों को क्या फायदा होता है?
सबसे बड़ा फायदा यह है कि आप सोना बेचे बिना उस पर कमाई कर सकते हैं। अभी गोल्ड लीजिंग पर करीब 2.75% से 4.5% तक का रिटर्न मिल सकता है।
सोने का मालिकाना हक निवेशक के पास ही रहता है। सोना सुरक्षित वॉल्ट में रखा जाता है। कई प्लेटफॉर्म पर 10 रुपये जैसी छोटी रकम से भी शुरुआत की जा सकती है।
क्या यह RBI के दायरे में आता है?
फिलहाल गोल्ड लीजिंग सीधे RBI के रेगुलेशन में नहीं आती। हालांकि डिजिटल गोल्ड इंडस्ट्री ने DPMACI नाम का उद्योग संगठन बनाया है।
यह संगठन डिजिटल गोल्ड के लिए कुछ बुनियादी नियम तय करने की कोशिश कर रहा है। मसलन, जितना डिजिटल गोल्ड बेचा जाए उसके बदले उतना ही असली सोना मौजूद हो, समय-समय पर उसकी जांच होती रहे और ग्राहकों की शिकायतों के समाधान की व्यवस्था भी हो।
गोल्ड लीजिंग में जोखिम भी हैं। सबसे बड़ा जोखिम यह है कि इस पर बैंक जमा जैसी बीमा सुरक्षा नहीं मिलती। यानी बैंक एफडी की तरह आपका पैसा सुरक्षित होने की सरकारी गारंटी नहीं होती। अगर सोना लेने वाला ज्वैलर अपनी जिम्मेदारी पूरे नहीं कर पाता, तो निवेशक को नुकसान हो सकता है।
कुछ प्लेटफॉर्म इस जोखिम को कम करने के लिए ज्वैलर्स से बैंक गारंटी लेते हैं। लेकिन इसकी शर्तें हर प्लेटफॉर्म पर अलग हो सकती हैं। इसके अलावा निवेशक को प्लेटफॉर्म, ज्वैलर और ट्रस्टी पर भरोसा करना पड़ता है। इसलिए निवेश से पहले प्लेटफॉर्म की विश्वसनीयता, सुरक्षा व्यवस्था और जोखिमों को अच्छी तरह समझ लेना जरूरी है।
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