Gold-Silver Crash: पिछले कुछ महीनों से गोल्ड और सिल्वर में जोरदार तेजी देखी जा रही थी। जनवरी के आखिर में सोना 1.80 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम तो चांदी 4 लाख रुपये किलो के पार पहुंच गया था। लेकिन, अब दोनों कीमती धातुओं में ऐतिहासिक बिकवाली हो रही।
Gold-Silver Crash: पिछले कुछ महीनों से गोल्ड और सिल्वर में जोरदार तेजी देखी जा रही थी। जनवरी के आखिर में सोना 1.80 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम तो चांदी 4 लाख रुपये किलो के पार पहुंच गया था। लेकिन, अब दोनों कीमती धातुओं में ऐतिहासिक बिकवाली हो रही।
ग्लोबल मार्केट में शुक्रवार, 30 जनवरी को स्पॉट गोल्ड करीब 10% टूट गया। यह 1980 के दशक की शुरुआत के बाद की सबसे बड़ी एकदिनी गिरावट मानी जा रही है। वहीं चांदी 27% से ज्यादा फिसली और इंट्रा-डे में तो इसमें 36% तक की गिरावट देखी गई।
भारत में MCX पर रविवार, 1 फरवरी को ओवरसीज गिरावट के असर से सोना और चांदी दोनों करीब 9% नीचे खुले। घरेलू बाजार में हाल के स्तरों पर सोना करीब ₹1.4 लाख प्रति 10 ग्राम और चांदी करीब ₹2.74 लाख प्रति किलो के आसपास ट्रेड होती दिखी।

बिकवाली की 5 बड़े कारण क्या रहे?
1. मुनाफावसूली : रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचने के बाद कई निवेशकों ने मुनाफा निकालना शुरू कर दिया। जब बड़े खिलाड़ियों ने एक साथ बिकवाली की, तो सोने-चांदी की कीमतों पर तुरंत दबाव बन गया।
2. अमेरिकी डॉलर की मजबूती: डॉलर मजबूत होते ही सोना और चांदी महंगे लगने लगते हैं। चूंकि इन पर कोई ब्याज नहीं मिलता, इसलिए मजबूत डॉलर के दौर में इनकी मांग कमजोर हो जाती है।
3. फेड का रुख: नए संभावित फेड चेयर के तौर पर केविन वार्श के नाम की चर्चा में आया। वो पहले सख्त मौद्रिक नीति के समर्थक माने जाते थे। इससे बाजार को लगा कि अब ब्याज दरों में बहुत ज्यादा कटौती नहीं होगी।
4. टेक्निकल करेक्शन : सोना और चांदी बहुत कम समय में बहुत ज्यादा चढ़ गए थे। एक्सपर्ट के मुताबिक, ऐसे में टेक्निकल तौर पर करेक्शन यानी गिरावट आना स्वाभाविक था।
5. ज्यादा सट्टेबाजी : हाल के महीनों में सोना-चांदी में सट्टा काफी बढ़ गया था। जब बाजार स्पेकुलेटिव हो जाता है, तो छोटी खबर भी बड़ी गिरावट की वजह बन जाती है।

क्या यह खरीद का सही मौका है?
इस सवाल पर बाजार के जानकारों की राय बंटी हुई है। उनका सोना और चांदी को लेकर नजरिया भी अलग-अलग है। कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि उतार-चढ़ाव के बावजूद सोने के लॉन्ग टर्म फंडामेंटल्स मजबूत बने हुए हैं। उनके मुताबिक, आने वाले दो सालों में सोने में फिर से तेजी देखने को मिल सकती है। वहीं, मीडियम टर्म में यह और ऊंचे स्तरों की ओर बढ़ सकता है।
चांदी को लेकर रुख ज्यादा सतर्क है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि चांदी हाल में काफी ओवरबॉट हो चुकी थी। इसमें आगे और गिरावट देखने को मिल सकती है। ग्लोबल स्तर पर चांदी के लिए काफी नीचे सपोर्ट लेवल की बात भी कही जा रही है।
अब क्या हो निवेश की रणनीति?
चांदी की ऐतिहासिक वोलैटिलिटी को देखते हुए कुछ जानकार एकमुश्त निवेश के बजाय चरणबद्ध तरीके से पैसा लगाने की सलाह दे रहे हैं। इससे एंट्री का जोखिम कम किया जा सकता है, जबकि सोलर, इलेक्ट्रॉनिक्स और मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर्स से जुड़ी इसकी स्ट्रक्चरल डिमांड में हिस्सेदारी भी बनी रहती है।
कुछ एक्सपर्ट्स इस गिरावट को ट्रेंड रिवर्सल नहीं, बल्कि एक हेल्दी कंसोलिडेशन मानते हैं। हालांकि उनका कहना है कि ऊंची कीमतों के चलते भारत में फिजिकल डिमांड पर असर पड़ा है। इसलिए निकट अवधि में सोना और चांदी दोनों में तेज उतार-चढ़ाव बना रह सकता है।

WhiteOak Capital की सख्त चेतावनी
WhiteOak Capital Mutual Fund ने अपनी रिपोर्ट ‘Gold is Talking, Silver is Screaming’ में ज्यादा रक्षात्मक रुख अपनाया है। रिपोर्ट के मुताबिक, जब चांदी सोने से कहीं ज्यादा तेजी दिखाती है, तो यह अक्सर सट्टेबाजी के शिखर का संकेत होता है, न कि किसी टिकाऊ ट्रेंड का।
इस रिपोर्ट में बताया गया है कि गोल्ड-सिल्वर रेशियो करीब 46:1 तक सिमट गया है। यह पिछले 10 साल के औसत करीब 80:1 से काफी नीचे है। इतिहास में इसे चांदी के लिए चेतावनी का संकेत माना जाता है।
ऐसे स्तरों पर चांदी आमतौर पर सोने के मुकाबले ज्यादा तेजी से और गहराई तक गिरती है। रिपोर्ट की सलाह है कि निवेशकों को पहले चांदी में मुनाफा बुक करना चाहिए और पोर्टफोलियो रीबैलेंस करना चाहिए। साथ ही, रिकॉर्ड कीमतों पर मेटल्स का पीछा करने के बजाय डाइवर्सिफाइड इक्विटीज में मुनाफे की रकम लगाना चाहिए।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि इक्विटीज में कैश फ्लो, डिविडेंड और सालाना ₹1.25 लाख तक के LTCG एग्जेम्प्शन जैसे फायदे मिलते हैं, जो फिजिकल गोल्ड और सिल्वर में नहीं होते।
निवेशकों के लिए क्या संकेत?
कुल मिलाकर, सोने में लॉन्ग टर्म निवेशकों के लिए मौके बन सकते हैं, लेकिन चांदी में जोखिम फिलहाल ज्यादा नजर आ रहा है। मौजूदा माहौल में जल्दबाजी से निवेश करने के बजाय चरणबद्ध खरीद, मुनाफावसूली और सही एसेट एलोकेशन पर ध्यान देना ज्यादा समझदारी भरा कदम माना जा रहा है।
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