सोने और चांदी को निवेश के लिहाज से सबसे सुरक्षित माना जाता है। दुनिया में जब कभी अस्थिरता बढ़ती है या जियोपॉलिटिकल टेंशन शुरू होता है तब दोनों कीमतों मेटल्स की डिमांड बढ़ जाती है। इसका असर दोनों की कीमतों पर पड़ता है। कीमतें चढ़ने लगती हैं। लेकिन, इस बार ऐसा नहीं दिख रहा। 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच लड़ाई शुरू हुई थी। इसके बाद से सोने और चांदी में उछाल नहीं दिखा है।
लड़ाई शुरू होने के बाद सोने और चांदी में कमजोरी
27 फरवरी के बाद से सोने की कीमतों में मामूली गिरावट आई है, जबकि चांदी में बड़ी गिरावट आई है। 27 फरवरी को सिल्वर फ्यूचर्स 2,82,730 रुपये प्रति किलो था। 6 मार्च को यह 262,569 रुपये प्रति किलोग्राम पर आ गया। यह 7.1 फीसदी की गिरावट है। 27 फरवरी को गोल्ड फ्यूचर्स 1,62,200 रुपये प्रति 10 ग्राम पर क्लोज हुआ था। 6 मार्च को यह 1,61,275 रुपये प्रति 10 ग्राम पर क्लोज हुआ। इसका मतलब है कि मध्यपूर्व में लड़ाई शुरू होने के बाद से सोना करीब 0.5 फीसदी कमजोर हुआ है।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि गोल्ड की कीमतें जियोपॉलिटिकल टेंशन के बावजूद नहीं चढ़ने की वजह यह नहीं है कि इसकी डिमांड कम हो गई है। इसकी डिमांड अब भी स्ट्रॉन्ग है। इसकी कीमतें नहीं चढ़ने की वजह यह है कि डॉलर में मजबूती है। डॉलर में मजबूती आने पर दूसरी करेंसी में सोना खरीदना महंगा हो जाता है। दूसरा, अमेरिकी इकोनॉमी से जुड़े हालिया डेटा से ऐसा लगता है कि फेडरल रिजर्व जल्द इंटरेस्ट रेट नहीं घटाएगा। इंटरेस्ट रेट में कमी से सोने की कीमतों को सपोर्ट मिलता है। इंटरेस्ट रेट नहीं बढ़ने की उम्मीद का असर भी सोने की कीमतों पर पड़ रहा है।
इनवेस्टर्स कीमतें बढ़ने पर प्रॉफिट बुक कर रहे हैं
हालांकि, 28 फरवरी को मध्यपूर्व में लड़ाई शुरू होने के बाद 3 मार्च को सोने की कीमतों में उछाल आया था। स्पॉट गोल्ड उछलकर 5,260 डॉलर प्रति औंस तक चला गया था। लेकिन, उसके बाद मुनाफावसूली की वजह से इसमें गिरावट देखने को मिली। एक्सपर्ट्स का कहना है कि गोल्ड की कीमतें नहीं चढ़ने की एक वजह मुनाफावसूली है। जनवरी के आखिर में बड़ी गिरावट के बाद कुछ इनवेस्टर्स और ट्रेडर्स गोल्ड में फंस गए थे। वे कीमतें चढ़ने पर प्रॉफिट बुक कर रहे हैं।
चांदी की इंडस्ट्रियल डिमांड कमजोर पड़ी
सिल्वर की कुल डिमांड में करीब 50 फीसदी हिस्सेदारी इंडस्ट्रियल डिमांड की है। चांदी का इस्तेमाल कई इंडस्ट्रीज में होता है। इनमें इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, सोलर पैनल्स, इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट्स प्रमुख हैं। अमेरिका-इजरायल और ईरान की लड़ाई का असर सिल्वर की इंडस्ट्रियल डिमांड पर पड़ा है।
जनवरी के अंत में रिकॉर्ड ऊंचाई पर थी कीमतें
अगर यह लड़ाई लंबी चलती है तो कई इंडस्ट्री पर असर पड़ेगा। इस लड़ाई की वजह से सेंटीमेंट कमजोर है। इसके अलावा सिल्वर ने पिछले एक-दो सालों में शानदार रिटर्न दिया है। एक समय इसकी कीमत इसके फंडामेंटल्स से आगे निकल गई थी। इसके बाद जनवरी के अंत में इसमें बड़ी गिरावट आई। इस वजह से भी कीमतों में उछाल नहीं है।