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नई नौकरी लगी है? पूरी जिंदगी खुशहाल रहना चाहते हैं तो ये कदम उठाइए

अपनी वित्तीय आजादी का आनंद लीजिए। खर्च कीजिए, लेकिन बुरे वक्त के लिए कुछ पैसा बचाइए

MoneyControl Newsअपडेटेड Jan 15, 2020 पर 1:04 PM
नई नौकरी लगी है? पूरी जिंदगी खुशहाल रहना चाहते हैं तो ये कदम उठाइए

करिश्मा 23 साल की हैं और आर्किटेक्चर में ग्रेजुएशन कर रही हैं। वह पुणे रहती हैं। उनकी ग्रेजुएशन मार्च 2020 में पूरी हो जाएगी। अप्रैल से उनका प्रोफेशनल करियर शुरू हो जाएगा। वह एक प्राइवेट कंपनी को जॉइन कर लेंगी।

फिलहाल उनका खर्च 10 से 15,000 रुपये महीना है और उनके पैरेंट्स ने उनकी पूरी पढ़ाई के दौरान यह खर्च उठाया।

लेकिन, अब करिश्मा परेशान है। उसे लगता है कि जॉब जॉइन करने के बाद अपनी पूरी वित्तीय जिम्मेदारी उसे खुद उठानी होगी। उसे लगता है कि नौकरी लगने के बाद मां-बाप उसे मासिक खर्च देना बंद कर देंगे और उसे अपना खर्च खुद ही उठाना होगा। उसे 4 लाख रुपये के एजूकेशन लोन की ईएमआई खुद देनी होंगी और अपने पोस्ट-ग्रेजुएशन प्रोग्राम की फीस के लिए बचत भी करनी होगी।

भारत में कई मिलेनियल्स के बीच यह एक आम स्थिति है। यह वह दौर है जब इस पीढ़ी के तमाम युवा अपनी पहली नौकरी की शुरुआत कर रहे हैं। करिश्मा बताती हैं, ‘अपने पैसों को सही तरीके से मैनेज करने के लिए पिछले एक साल से ही मैंने अखबार, पत्रिकाएं, पर्सनल फाइनेंस ब्लॉग पढ़ना और खबरें देखना शुरू कर दिया है।’ करिश्मा अपने पैरेंट्स से घर का बजट बनाना सीख रही है। वह छुट्टियों और वीकेंड्स के दौरान फाइनेंशियल प्लानिंग वर्कशॉप अटेंड करती हैं ताकि निवेश के लिए अलग-अलग एसेट क्लास के बारे में समझ सकें और बीमा, टैक्स-प्लानिंग जैसी चीजों के बारे में जानकारी हासिल कर सकें।

पीकअल्फा इनवेस्टमेंट सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर श्याम सुंदर कहते हैं, ‘ऐसा पाया गया है कि अगर कोई शख्स उम्र के 20वें दशक की शुरुआत में ही समझदारी से और वित्तीय स्किल्स के साथ अपने पैसों को मैनेज करने लगता है तो वह काफी फायदे में रहता है क्योंकि इस उम्र में व्यक्ति को अपने पार्टनर या बच्चे की देखभाल पर पैसा खर्च नहीं करना पड़ता है।’

यहां हम आपको कुछ ऐसी फाइनेंशियल प्लानिंग की टिप्स दे रहे हैं जिनके साथ आप अपने फाइनेंशियल प्लानिंग के सफर की शुरुआत कर सकते हैं।

आपातकालीन फंड और इनवेस्टमेंट प्लानिंग

प्रशांत गायतोंडे एक सॉफ्टवेयर डेवलपर हैं और बंगलुरु में रहते हैं। वह 25 साल के हैं। 2017 की जुलाई में जब उन्होंने नौकरी की शुरुआत की उस वक्त वह अपने पैसों के प्रबंधन को लेकर उहापोह में थे। उन्हें निवेश के तरीकों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। एक आकस्मिक फंड बनाने के बारे में भी वह ज्यादा वाकिफ नहीं थे जो कि सेविंग और इनवेस्टमेंट की पहली सीढ़ी माना जाता है। नौकरी शुरू करने के शुरुआती महीनों में वह अपनी सेविंग्स को अपने गैरजरूरी खर्चों के लिए इस्तेमाल करते थे। चूंकि उन्हें निवेश के दूसरे जरियों के बारे में पता नहीं था, ऐसे में उन्होंने अपने पैरेंट्स की सलाह पर अमल करते हुए फिक्स्ड डिपॉजिट्स में पैसा लगाया। नौकरी के शुरुआती 15 महीनों में वह करीब 4 लाख रुपये बचाने में सफल रहे और यह पूरा पैसा उन्होंने बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट में लगा दिया।

नवंबर 2018 में वह अपनी कंपनी की आयोजित कराई फाइनेंशियल प्लानिंग वर्कशॉप में शरीक हुए। वहां उन्होंने सीखा कि आकस्मिक फंड वह रकम होती है जो कि खासतौर पर बेहद मुश्किल हालातों से निपटने के लिए इकट्ठी की जाती है। इन आकस्मिक परिस्थितियों में नौकरी का अचानक छूटने, कोई गंभीर बीमारी होने जैसी चीजें आती हैं। सॉफ्टवेयर डेवलपर के तौर पर प्रशांत नौकरियां खत्म होने की घटनाओं से अच्छी तरह से वाकिफ थे जो कि आईटी सेक्टर में पिछले कुछ सालों से एक आम बात है। अब उन्होंने फिक्स्ड डिपॉजिट्स में लगाए गए अपने 4 लाख रुपयों का एक हिस्सा अपने तीन महीने के खर्च की जरूरत के हिसाब से अलग रख लिया। उन्होंने लिक्विड और अल्ट्रा-शॉर्ट टर्म म्यूचुअल फंड स्कीमों में पैसा निवेश कर यह आकस्मिक फंड तैयार किया।

टाटा कैपिटल फाइनेंशियल सर्विसेज के वेल्थ मैनेजमेंट के हेड सौरभ बसु के मुताबिक, ‘मिलेनियल्स को 50:20:30 के थंब रूल पर चलना चाहिए। इसमें 50 फीसदी इनकम रोजाना के खर्चों पर जानी चाहिए। 20 फीसदी रकम शॉर्ट-टर्म गोल्स को पूरा करने के लिए बचाई जानी चाहिए। 30 फीसदी रकम लॉन्ग-टर्म गोल्स जैसे कि बच्चों की पढ़ाई, शादी, रिटायरमेंट के लिए बचाई जानी चाहिए।’

फाइनेंशियल प्लानर से जुड़ने के बाद प्रशांत को लॉन्ग-टर्म गोल्स को पूरा करने के लिए डायवर्सिफिकेशन और इक्विटीज में निवेश का महत्व समझ आ गया था। उन्होंने फिक्स्ड डिपॉजिट्स में जमा ज्यादा रकम को निकाला और इसे लार्ज-कैप फंड्स में लगा दिया। इसके बाद उन्होंने मिड और मल्टी-कैप म्यूचुअल फंड स्कीमों में मंथली इनवेस्टमेंट शुरू कर दिया। सुंदर कहते हैं, ‘मिलेनियल इनवेस्टर्स को लार्ज-कैप या इंडेक्स फंड्स में पैसा लगाना शुरू करना चाहिए और इसके बाद मल्टी-कैप या मिड-कैप फंड्स में खुद को डायवर्सिफाई करना चाहिए। हालांकि, यह काम अपनी जोखिम झेलने की क्षमता के हिसाब से किया जाना चाहिए।’

अक्सर मिलेनियल्स को लगता है कि रिटायरमेंट काफी दूर है और ऐसे में वे इस गोल के लिए निवेश करने से बचते हैं। हालांकि, कम उम्र की वजह से इनके लिए रिटायरमेंट के लिए हर महीने किया जाने वाला निवेश काफी कम हो जाता है।

एंप्लॉयर के बीमा पर ही निर्भर न रहें

इन दिनों कंपनियां कर्मचारियों को बीमा कवर देती हैं। इनमें हेल्थ, पर्सनल एक्सीडेंट और लाइफ इंश्योरेंस बेनेफिट्स जैसी पॉलिसीज होती हैं। हालांकि, कंपनियों के दिए जाने वाले बीमा कवर एंप्लॉयी की रैंक और पद पर आधारित होते हैं। कई कर्मचारियों के लिए तो यह कवर बिलकुल नाकाफी होता है।

मिसाल के तौर पर, प्रशांत के एंप्लॉयर ने उसे 4 लाख रुपये का हेल्थ कवर दिया था। मौजूदा वक्त की महंगाई को देखते हुए यह रकम प्रशांत और उनके परिवार के लिए कम है। ऐसे में, अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से सलाह लेकर उन्होंने 10 लाख रुपये की फैमिली फ्लोटर पॉलिसी ले ली।

आर्वी इंश्योरेंस ब्रोकर्स की सीईओ और डायरेक्ट राधिका शाह के मुताबिक, ‘मिलेनियल्स उम्र के 20वें और 30वें दशक के बीच कई बार नौकरियां बदलते हैं। ऐसे में एंप्लॉयर की इंश्योरेंस पॉलिसी पर निर्भर रहना बेस्ट ऑप्शन नहीं है।’ सीधी बात यह है कि जब आप अपनी मौजूदा नौकरी बदलते हैं तो इंश्योरेंस बेनेफिट्स नए एंप्लॉयर के यहां ट्रांसफर नहीं होते हैं।

साथ ही, यह भी हो सकता है कि नया एंप्लॉयर इंश्योरेंस बेनेफिट्स ऑफर ही नहीं कर रहा हो और ऐसे में आपको इंश्योरेंस पॉलिसी खरीदनी पड़ सकती है। अगर आपकी हेल्थ खराब होती है तो इंश्योरेंस कंपनी आपसे ज्यादा प्रीमियम ले सकती है। शाह सलाह देते हैं, ‘हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी ऐसे वक्त पर खरीदिए जब आप युवा हों और आपको कोई गंभीर बीमारी न हो। साथ ही युवा होने पर प्रीमियम भी कम लगता है।’

एजूकेशन लोन चुकाएं

ज्यादातर मिलेनियल्स के लिए एजूकेशन लोन एक बड़ा बोझ होता है। एजूकेशनल लोन चुकाने में ज्यादातर सेविंग्स चली जाती है। आपको अपने खर्च कम करने चाहिए ताकि बचत के पैसे निवेश किए जा सकें।

साथ ही आपको अपना एजूकेशन लोन जल्द से जल्द चुकाने पर फोकस करना चाहिए। इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 80ई के तहत एजूकेशन लोन पर चुकाया गया पूरा ब्याज डिडक्शन का हकदार होता है। इनकम टैक्स डिडक्शन को आठ साल तक क्लेम किया जा सकता है।

लेकिन, लोन को जल्द से जल्द चुकाना ही सबसे अच्छा तरीका होता है। सुंदर कहते हैं, ‘मान लीजिए आपकी सालाना इनकम कम है(यानी कि आप टैक्स छूट वाले ब्रैकेट में आते हैं), ऐसे में आपको एजूकेशन लोन का पूरा बोझ उठाना पड़ेगा। आपको कोई टैक्स बेनेफिट्स नहीं मिलेगा।’ ऐसे लोगों के लिए एजूकेशन लोन को जल्द से जल्द चुकाना ही बेहतर होता है।

फिजूलखर्ची से बचें और जरूरत से ज्यादा लोन न लें

ऐप बेस्ड क्रेडिट लाइन मनीटैप की एक स्टडी के मुताबिक, 2019 में मिलेनियल्स ने जिन तीन प्रमुख वजहों के लिए लोन लिया उनमें बिलों का भुगतान (25।09 फीसदी), मेडिकल खर्च (21।25 फीसदी) और शादी पर खर्च (14 फीसदी) आते हैं। मिलेनियल्स के लिए क्रेडिट कार्ड्स का इस्तेमाल रिस्की हो सकता है क्योंकि इससे वे अपनी सैलरी को उड़ाने से रोक नहीं पाते हैं। आसानी से मिलने वाला कर्ज, जबरदस्त रिवॉर्ड पॉइंट्स, कैशबैक ऑफर्स और डिस्काउंट्स मिलेनियल्स को कर्ज में धकेलते हैं।

अक्सर ऐसा होता है कि लोग अपनी चुकाने की क्षमता से ज्यादा कर्ज ले लेते हैं। इस तरह की स्थिति से बचने के लिए प्रशांत ने नौकरी लगने के शुरुआती 15 महीने तक किसी क्रेडिट कार्ड के लिए एप्लाई नहीं किया। पैसाबाजार।कॉम के डायरेक्टर और इनवेस्टमेंट्स और इंश्योरेंस के ग्रुप बिजनेस हेड साहिल अरोड़ा ने कहा, ‘फिजूलखर्ची रोकने का सबसे सही तरीका यह है कि अपने क्रेडिट कार्ड के अनबिल्ड बैलेंस पर नजर रखी जाए और केवल उतना ही खर्च किया जाए जितना बिल की आखरी तारीक तक चुकाया जा सके।’

मौजूदा वक्त में पेडे लोन भी मिलेनियल्स के बीच काफी लोकप्रिय हो रहे हैं। ये अल्ट्रा-शॉर्ट टर्म, अनसिक्योर्ड और ऊंचे ब्याज वाले पर्सनल लोन होते हैं। ये छोटे आकार के लोन होते हैं और कैश फ्लो में आने वाले अस्थाई अंतर को भरते हैं। इनमें लोन की रकम 500 रुपये से लेकर कुछ लाख रुपये तक होती है। इनमें इंटरेस्ट रेट 1 फीसदी प्रतिदिन होता है जो कि 365 फीसदी सालाना बैठता है। कई मिलेनियल्स इनका इस्तेमाल रेगुलर तौर पर खरीदारी और फिजूलखर्ची के लिए करते हैं। स्टेबलइनवेस्टर।कॉम के फाउंडर देव आशीष के मुताबिक, ‘अगर मिलेनियल्स सावधानी से नहीं चलते हैं तो ये महंगे कर्ज उन्हें कर्ज के जाल में धकेल सकते हैं।’ इस तरह के लोन फिजूलखर्ची के लिए नहीं लिए जाने चाहिए।

फाइनल-ईयर कॉलेज ग्रेजुएट्स नौकरी लगने से कुछ ही महीने दूर हैं। दूसरी ओर, मिलेनियल्स और खासतौर पर ऐसे युवा जिन्हें नौकरी शुरू करे अभी कुछ ही वक्त हुआ है, वे पैसों का प्रबंधन सीख रहे हैं।

एक फाइनेंशियल प्लान बनाइए। अपनी वित्तीय आजादी का आनंद लीजिए। खर्च कीजिए, लेकिन बुरे वक्त के लिए कुछ पैसा बचाकर रखिए।

हीरल थानावाला की रिपोर्ट

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