Home Loan EMI: होम लोन में ये गलती करा देगी लाखों का नुकसान, जानिए क्या है बचने का तरीका

Home Loan EMI: होम लोन में फिक्स्ड और फ्लोटिंग रेट का चुनाव लाखों का फर्क पैदा कर सकता है। ₹50 लाख के लोन में करीब ₹18-19 लाख का अंतर आ सकता है। जानिए कहां होती है गलती और कैसे बचें नुकसान से।

अपडेटेड Apr 16, 2026 पर 7:44 PM
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कई लोगों ने उस समय वक्त फिक्स्ड रेट लोन लिया, जब ब्याज दरें ऊंची थीं।

Home Loan EMI: होम लोन लेते समय ज्यादातर लोग EMI, लोन अमाउंट और शर्तों पर ज्यादा ध्यान देते हैं। लेकिन एक फैसला ऐसा होता है, जो चुपचाप पूरे लोन की लागत तय कर देता है- आपने फिक्स्ड रेट चुना है या फ्लोटिंग रेट। और इसका असर काफी बड़ा हो सकता है।

ब्याज दर में थोड़ा सा फर्क भी 15-20 साल के लोन में लाखों रुपये का अंतर पैदा कर देता है। अभी भारत में फ्लोटिंग होम लोन की दरें करीब 7.1% से 8.5% के बीच हैं। वहीं, फिक्स्ड रेट 9.5% से 11% तक जा रहे हैं। यही अंतर आपके कुल खर्च को काफी बदल देता है।

₹50 लाख के लोन पर कितना अंतर?


अब मान लीजिए कि आपने ₹50 लाख का होम लोन 20 साल के लिए लिया। फ्लोटिंग रेट 7.5% के आसपास है, तो इस पर EMI करीब ₹40,300 के आसपास बनेगी। 20 साल में कुल भुगतान करीब ₹96.7 लाख होगा, यानी लगभग ₹46.7 लाख सिर्फ ब्याज के रूप में देना पड़ेगा।

अब अगर यही लोन 10% फिक्स्ड रेट पर लिया जाए, तो EMI बढ़कर करीब ₹48,200 हो जाती है। इस स्थिति में 20 साल में कुल भुगतान करीब ₹1.15 करोड़ तक पहुंच जाता है। यानी सिर्फ ब्याज ही करीब ₹65 लाख के आसपास चला जाता है।

दोनों के बीच फर्क देखें तो EMI में हर महीने करीब ₹8,000 का अंतर आता है, और कुल मिलाकर करीब ₹18-19 लाख ज्यादा चुकाने पड़ सकते हैं। यही वजह है कि ब्याज दर का छोटा सा अंतर भी लंबे समय में बहुत बड़ा असर डालता है।

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फ्लोटिंग रेट में बचत... पर जोखिम भी

आपको फ्लोटिंग रेट वाले होम लोन में ज्यादा बचत तब होगी, जब ब्याज दर स्थिर रहे। किसी भी अर्थव्यवस्था में ऐसा होना तकरीबन नामुमकिन रहता है। फिक्स्ड रेट लोन में आपकी EMI और ब्याज दर पूरे समय के लिए तय रहती है, इसलिए आपको पहले दिन से ही पता होता है कि कितना चुकाना है। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है- अनिश्चितता नहीं होती। लेकिन अगर बाजार में दरें गिरती हैं, तो आप उसी ऊंची दर पर फंसे रहते हैं और फायदा नहीं उठा पाते।

वहीं फ्लोटिंग रेट सस्ता दिखता है, लेकिन इसमें जोखिम छिपा होता है। यह दरें RBI और बाजार के हिसाब से बदलती रहती हैं। अगर आने वाले समय में ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो आपकी EMI बढ़ सकती है या लोन की अवधि लंबी हो सकती है। यानी आज जो सस्ता लग रहा है, वह आगे चलकर महंगा भी पड़ सकता है। यही वजह है कि इसमें फैसला सिर्फ आज की दर देखकर नहीं, बल्कि भविष्य के रेट साइकल को समझकर लेना चाहिए।

होम लोन वाले कहां गलती करते हैं?

कई लोगों ने उस समय वक्त फिक्स्ड रेट लोन लिया, जब ब्याज दरें ऊंची थीं। उन्हें लगा कि इससे भविष्य में दरें बढ़ने का असर नहीं पड़ेगा। लेकिन 2025 में RBI ने कई बार रेपो रेट घटाया, जिससे फ्लोटिंग रेट वाले लोगों की EMI कम हो गई। वहीं फिक्स्ड रेट वाले लोग वही ऊंची ब्याज दर चुकाते रहे और इस गिरावट का फायदा नहीं उठा पाए। यहीं असली नुकसान हुआ।

फिक्स्ड रेट स्थिरता देता है, लेकिन अगर दरें गिर जाएं तो यह महंगा पड़ सकता है। वहीं फ्लोटिंग रेट बाजार के हिसाब से बदलता है। यह चीज आपके हक में भी जा सकती है और खिलाफ भी।

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अब आपको क्या करना चाहिए

सबसे पहले यह समझें कि आपका लोन किस तरह का है। कई लोग अभी भी MCLR या बेस रेट वाले पुराने सिस्टम पर हैं, जहां दरों में बदलाव जल्दी लागू नहीं होता। वहीं रेपो रेट से जुड़े नए लोन में बदलाव जल्दी दिखता है।

अगर आप पुराने सिस्टम में हैं, तो स्विच करना फायदेमंद हो सकता है। अगर आप फिक्स्ड रेट पर हैं, तो यह जरूर देखें कि क्या यह अभी भी सही है। अगर बाजार की दरें कम हैं, तो फ्लोटिंग रेट पर जाना आपके कुल ब्याज खर्च को कम कर सकता है, भले ही कुछ चार्ज देना पड़े।

अगर आप फ्लोटिंग रेट पर हैं, तो थोड़ा सावधान रहना जरूरी है। अगर बजट टाइट है, तो कुछ प्रीपेमेंट कर लें या इमरजेंसी फंड बना लें, ताकि भविष्य में EMI बढ़ने पर परेशानी न हो।

फिक्स्ड और फ्लोटिंग में कौन सा बेहतर

फिक्स्ड और फ्लोटिंग में कौन बेहतर है, इसका कोई सीधा जवाब नहीं है। अगर आपकी इनकम स्थिर है और आप जोखिम नहीं लेना चाहते, तो फिक्स्ड रेट बेहतर माना जाता है। इसमें EMI तय रहती है, इसलिए बजट प्लान करना आसान होता है और अचानक बढ़ोतरी का डर नहीं रहता। खासकर ऐसे समय में जब आपको लगता है कि आगे ब्याज दरें बढ़ सकती हैं, फिक्स्ड रेट एक सुरक्षित विकल्प बन जाता है।

वहीं अगर आप थोड़ा जोखिम ले सकते हैं और लंबी अवधि में कम ब्याज का फायदा उठाना चाहते हैं, तो फ्लोटिंग रेट ज्यादा फायदेमंद हो सकता है। यह बाजार के साथ चलता है, इसलिए जब दरें घटती हैं तो EMI या ब्याज का बोझ कम हो जाता है। लेकिन इसमें उतार-चढ़ाव का जोखिम भी रहता है, इसलिए यह उन्हीं लोगों के लिए बेहतर है जिनके पास फाइनेंशियल बफर हो और जो बदलती EMI को संभाल सकें।

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