Income Tax: क्या आप इनकम टैक्स की नई रीजीम में जाने की सोच रहे हैं या आपने पहले से ही इसमें स्विच हो चुके हैं? अगर हां तो आपको अपनी इनवेस्टमेंट स्ट्रेटेजी को रिव्यू करना होगा। इसकी वजह यह है कि इनकम टैक्स की पुरानी रीजीम में कई इनवेस्टमेंट ऑप्शंस पर डिडक्शन मिलता है, जो नई रीजीम में नहीं मिलता है। टैक्सपेयर्स खासकर इंडिविजुअल टैक्सपेयर्स नई रीजीम में अब ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे है। इसकी वजह यह है कि इसमें टैक्स के रेट्स कम हैं और यह काफी आसान है।
पीपीएफ और ईएलएसएस पर टैक्स बेनेफिट्स
सवाल है कि अगर आप नई रीजीम का इस्तेमाल करने वाले हैं या कर रहे हैं तो आपके पब्लिक प्रोविडेंट फंड (PPF) और इक्विटी लिंक्ड सेविंग्स स्कीम (ELSS) में निवेश का क्या होगा? ये दोनों काफी लोकप्रिय लॉन्ग टर्म इनवेस्टमेंट ऑप्शंस रहे हैं। इनमें निवेश से लंबी अवधि में आसानी से बड़ा फंड तैयार हो जाता है साथ ही टैक्स बेनेफिट भी मिलता है। दोनों इनकम टैक्स एक्ट, 1961 के सेक्शन 80सी के तहत आते हैं।
प्लानरूपी इनवेस्टमेंट सर्विसेज के फाउंडर अमोल जोशी ने कहा, "नई टैक्स रीजीम में आपको पीपीएफ और ईएलएसएस जैसे सेक्शन 80सी के तहत आने वाले इनवेस्टमेंट ऑप्शंस पर टैक्स बेनेफिट नहीं मिलेगा। इसका मतलब है कि अगर आप टैक्स बेनेफिट्स के लिए इनमें निवेश कर रहे हैं तो आपको इनमें निवेश जारी रखने की जरूरत नहीं है।" उन्होंने कहा कि लेकिन आपको भविष्य के फाइनेंशियल गोल्स को हासिल करने के लिए सेक्शन 80सी के बाहर के इनवेस्टमेंट ऑप्शंस में निवेश करना होगा।
PPF निवेश के लिए सुरक्षित, टैक्स के लिहाज से फायदेमंद और अच्छा रिटर्न वाला इनवेस्टमेंट ऑप्शन रहा है। सरकार की स्कीम होने की वजह से इसमें निवेश पूरी तरह सुरक्षित है। लंबी अवधि में कंपाउंडिंग का फायदा मिल जाता है। टैक्स के मामले में इसे EEE का दर्जा हासिल है। इसका मतलब है कि निवेश, इंटरेस्ट और मैच्योरिटी किसी स्टेज पर टैक्स नहीं लगता है। इस वजह से इस स्कीम का अट्रैक्शन बढ़ जाता है। नई रीजीम का इस्तेमाल करने वाले टैक्सपेयर्स अब भी इस स्कीम में निवेश कर सकते हैं। फर्क सिर्फ यह है कि वे इस स्कीम में निवेश पर डिडक्शन क्लेम नहीं कर सकेंगे।
Bhuta Shah & Company LLP के पार्टनर (डायरेक्ट टैक्स) जिग्नेश शाह ने कहा, "अगर आपने नई रीजीम में स्विच किया है तो पीपीएफ में अपने नए कंट्रिब्यूशन पर सेक्शन 80सी के तहत डिडक्शन क्लेम नहीं कर सकेंगे। हालांकि, पीपीएफ में जमा पैसे पर आपको टैक्स-फ्री इंटरेस्ट मिलता रहेगा। मैच्योरिटी अमाउंट पर भी कोई टैक्स नहीं देना होगा। इसलिए लंबी अवधि (15 साल मैच्योरिटी) में बड़ा फंड तैयार करने के लिए आप पीपीएफ में सालाना 1.5 लाख रुपये का कंट्रिब्यूशन जारी रख सकते हैं।"
ELSS का मतलब म्यूचुअल फंड की टैक्स सेविंग्स स्कीम से है। यह एक तरह से म्यूचुअल फंड की इक्विटी स्कीम की तरह है। हालांकि, इसमें तीन साल का लॉक-इन पीरियड है, जो हर टैक्स सेविंग्स ऑप्शन में होता है। लंबी अवधि में निवेश करने पर कंपाउंडिंग का फायदा मिलता है। इससे इनवेस्टर के लिए आसानी से बड़ा फंड तैयार हो जाता है। ईएलएसएस स्कीम रिटर्न के मामले में काफी अट्रैक्टिव है। यह सेक्शन 80सी के तहत आने वाले इनवेस्टमेंट ऑप्शंस में शामिल है। इसलिए पुरानी रीजीम के टैक्सपेयर्स इस स्कीम में निवेश पर डिडक्शन क्लेम कर सकते हैं। लेकिन, नई रीजीम के टैक्सपेयर्स को इसकी इजाजत नहीं है।
जियोजित फाइनेंशियल सर्विसेज के हेड ऑफ इनवेस्टमेंट एडवायजरी जीवन कुमार केसी ने कहा, "तीन साल के पीरियड में लार्जकैप और मिडकैप फंडों का सीएजीआर रिटर्न 19.38 फीसदी रहा, जबकि ELSS का 17.10 फीसदी रहा।" टैक्स डिडक्शन के फायदे को देखा जाए तो इस मामले में रिटर्न के मामले में ईएलएसएस ज्यादा अट्रैक्टिव लगता है। उन्होंने कहा, "मेरा मानना है कि अगर टैक्स के फायदे को छोड़ दिया जाए तो भी ELSS में लॉन्ग टर्म में बड़ा फंड तैयार करने की कपैसिटी है। " अगर आप लंबी अवधि के लिए निवेश कर रहे हैं तो 3 साल की लॉक-इन पीरियड कोई बाधा नहीं है।
अगर निवेश पर मिलने वाले रिटर्न और उस पर टैक्स के लिहाज से देखा जाए तो पीपीएफ और ईएलएसएस का अट्रैक्शन नई रीजीम के टैक्सपेयर्स के लिए भी कम नहीं हुआ है। दोनों में कंपाउंडिंग का फायदा मिलता है। पीपीएफ के मैच्योरिटी अमाउंट पर टैक्स नहीं लगता है। ELSS का एक वित्त वर्ष में 1.25 लाख रुपये तक का लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेंस टैक्स-फ्री है। अगर आप लंबी अवधि के लिहाज से निवेश कर रहे हैं तो आप नई रीजीम में स्विच करने के बाद भी आप दोनों में निवेश जारी रख सकते हैं।