ITR Filing 2026: इन 6 मामलों में रिटर्न की गहराई से जांच कर सकता है टैक्स विभाग, जानिए बचने का तरीका
ITR Filing 2026: ITR भरते समय की गई छोटी गलती भी इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की नजर में ला सकती है। CBDT ने 6 ऐसे मामलों की पहचान की है, जहां रिटर्न की गहराई से जांच हो सकती है। जानिए किन बातों का ध्यान रखकर स्क्रूटनी का जोखिम कम किया जा सकता है।
अगर किसी टैक्सपेयर्स के यहां सेक्शन 133A के तहत सर्वे हुआ है, तो उसका रिटर्न स्क्रूटनी के लिए चुना जा सकता है।
ITR Filing 2026: इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) भरने के बाद ज्यादातर लोगों का रिटर्न बिना किसी दिक्कत के प्रोसेस हो जाता है। लेकिन कुछ मामलों में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट रिटर्न की गहराई से जांच करता है। सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज (CBDT) ने फाइनेंशियल ईयर 2026-27 के लिए ऐसे मामलों की सूची जारी की है, जिन्हें अनिवार्य स्क्रूटनी के लिए चुना जा सकता है।
क्या होती है स्क्रूटनी?
स्क्रूटनी असेसमेंट एक जांच प्रक्रिया है। इसमें इनकम टैक्स डिपार्टमेंट आपकी इनकम, डिडक्शन, एग्जेम्प्शन, इन्वेस्टमेंट और दूसरे दावों की जांच करता है। अनिवार्य स्क्रूटनी में रिटर्न पहले से तय नियमों के आधार पर चुना जाता है। इसमें यह जरूरी नहीं है कि आपने बड़ा रिफंड मांगा हो या आपका रिस्क स्कोर ज्यादा हो। आइए जानते हैं कि किन मामलों में स्क्रूटनी हो सकती है।
1. सर्वे वाले मामले
अगर किसी टैक्सपेयर्स के यहां सेक्शन 133A के तहत सर्वे हुआ है, तो उसका रिटर्न स्क्रूटनी के लिए चुना जा सकता है। डिपार्टमेंट यह देखता है कि सर्वे के दौरान मिली जानकारी और ITR में दिखाई गई इनकम आपस में मेल खाती है या नहीं।
2. सर्च एंड सीजर वाले मामले
जिन मामलों में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने सर्च एंड सीजर की कार्रवाई की है, उनमें भी रिटर्न की विस्तृत जांच हो सकती है। ऐसे मामलों में इनकम, एसेट्स, इन्वेस्टमेंट और बड़े फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन को बारीकी से देखा जाता है।
3. रीअसेसमेंट वाले मामले
अगर डिपार्टमेंट को लगता है कि आपकी कुछ इनकम पर टैक्स नहीं लगा है, तो वह रीअसेसमेंट नोटिस जारी कर सकता है। ऐसे मामलों में रिटर्न को अनिवार्य स्क्रूटनी के लिए चुना जा सकता है।
4. टैक्स चोरी से जुड़ी जानकारी
अगर इन्वेस्टिगेशन विंग, रेगुलेटरी एजेंसियों, लॉ एनफोर्समेंट एजेंसियों या इंटेलिजेंस यूनिट्स से टैक्स चोरी से जुड़ी भरोसेमंद जानकारी मिलती है, तो रिटर्न की जांच हो सकती है। इसमें अनडिस्क्लोज्ड फॉरेन एसेट्स, संदिग्ध ट्रांजैक्शन, अकॉमोडेशन एंट्री या ऐसी इनकम शामिल हो सकती है, जिसे रिटर्न में नहीं दिखाया गया हो।
5. टैक्स छूट लेने वाली संस्थाएं
ट्रस्ट, एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस, रिसर्च बॉडीज और टैक्स एग्जेम्प्शन का दावा करने वाली दूसरी संस्थाएं भी स्क्रूटनी के दायरे में आ सकती हैं। खासकर तब, जब उनका रजिस्ट्रेशन, अप्रूवल या रिकग्निशन रद्द कर दिया गया हो या वापस ले लिया गया हो।
6. बार-बार सामने आने वाले विवाद
अगर किसी टैक्सपेयर्स के पिछले असेसमेंट ईयर में किसी खास मुद्दे पर बड़ी टैक्स एडिशन हुई थी और वह मामला अंतिम रूप ले चुका है, तो ऐसे मामले दोबारा भी स्क्रूटनी के लिए चुने जा सकते हैं। इसमें ट्रांसफर प्राइसिंग जैसे विवाद भी शामिल हैं। यहां हर साल एक जैसे टैक्स मुद्दे सामने आते हैं।
स्क्रूटनी का जोखिम कैसे कम करें?
कोई भी यह गारंटी नहीं दे सकता कि उसका रिटर्न कभी स्क्रूटनी में नहीं जाएगा। फिर भी कुछ बातों का ध्यान रखकर अनावश्यक सवालों से बचा जा सकता है। सभी इनकम सही-सही दिखाएं। फॉर्म 26AS, AIS और TIS से आंकड़ों का मिलान करें। फॉरेन इनकम और फॉरेन एसेट्स की जानकारी जहां जरूरी हो, वहां जरूर दें।
डिडक्शन और एग्जेम्प्शन से जुड़े दस्तावेज संभालकर रखें। कैपिटल गेन, डिविडेंड इनकम और बिजनेस रिसीट्स को ध्यान से भरें। बिना आधार वाले या बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों से बचें।
अगर नोटिस आ जाए तो क्या करें?
अगर आपका रिटर्न स्क्रूटनी के लिए चुना जाता है, तो नोटिस को नजरअंदाज न करें। तय समय के भीतर जवाब दें। जरूरी दस्तावेज इनकम टैक्स पोर्टल पर अपलोड करें।
अगर मामला जटिल है और उसमें कैपिटल गेन, फॉरेन एसेट्स, फॉरेन इनकम, बिजनेस इनकम या बड़े फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन शामिल हैं, तो टैक्स एक्सपर्ट की मदद लेना बेहतर रहेगा। सही और समय पर जवाब देने से असेसमेंट की प्रक्रिया आमतौर पर आसानी से पूरी हो जाती है।
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