Delayed or stalled projects : भारत में बड़ी संख्या में फ्लैट्स का निर्माण अटका हुआ है या बेहद सुस्त गति से काम हो रहा है। प्रॉपर्टी कंसल्टैंट्स एनारॉक प्रॉपर्टी (ANAROCK) की बीते साल की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के रेजिडेंशियल सेक्टर में हाउसिंग प्रोजेक्ट्स में देरी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। कई प्रोजेक्ट्स का काम तो पूरी तरह ठप हो गया है।
शीर्ष 7 शहरों में अटके हुए 1,74,000 घरों की कुल वैल्यू 1,40,613 करोड़ रुपये है। इनमें से 65 फीसदी यूनिट की कीमत 80 लाख रुपये से कम है। सबसे ज्यादा यूनिट राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (1,13,860) में अटकी हैं, जिसके बाद मुंबई महानगरीय क्षेत्र (41,720) का नंबर है।
यदि बिल्डर के खिलाफ दिवालिया की प्रक्रिया चालू न हुई हो तो सुस्त गति वाले प्रोजेक्ट्स में फंसे होमबायर्स के पास सीमित विकल्प होते हैं। हम यहां ऐसे विकल्प के बारे में बता रहे हैं, जो होमबायर्स अपना सकते हैं।
रियल एस्टेट रेगुलेटर को करें शिकायत
केएस लीगल एंड एसोसिएट्स की मैनेजिंग पार्टनर सोनम चांदवानी ने कहा, “वह या तो रिफंड हासिल करने में आपको मदद करेगा या बिल्डर पर प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए दबाव बनाएगा। देरी की वजह कोई भी हो लेकिन इससे होमबायर्स को खासी परेशानी होती है, क्योंकि वे लोन की ईएमआई का भुगतान करते हैं।” होमबायर्स देरी के लिए भी भुगतान के पात्र होते हैं। वे देरी पर रेरा के नियमों के तहत पजेशन मिलने तक ब्याज पाने के हकदार होते हैं। रेरा के आदेशों के खिलाफ मिलने वाली याचिकाओं की सुनवाई के लिए रियल एस्टेट अपीली ट्रिब्यूनल (आरईएटी) की स्थापना की गई है। आरईएटी के आदेशों को हाई कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भले ही रेरा का सेक्शन 79 सिविल कोर्ट्स के अधिकार क्षेत्र को सीमित करता है, लेकिन बिल्डर के खिलाफ मामलों पर नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन में सुनवाई हो सकती है।
भारत के बड़े शहरों में शहर स्तर के फोरम हैं। हर राज्य मे एक राज्य स्तर का फोरम है। ये फोरम कंज्यूमर कोर्ट्स की तरह काम करते हैं जहां कंज्यूमर बिल्डर के खिलाफ शिकायत कर सकता है। ये फोरम प्रॉपर्टी की वैल्यू के आधार पर शिकायतें सुनते हैं।
क्या बेच देनी चाहिए प्रॉपर्टी?
आम तौर पर, सुस्त प्रोजेक्ट्स के साथ मुख्य समस्या का पैसे का नुकसान होता है। इसलिए, उसे बेच देना एक विकल्प हो सकता है। हालांकि खरीदार तलाशना आसान नहीं है।
नई दिल्ली की एक रियल एस्टेट ब्रोकरेज कंपनी होमेंट्स के फाउंडर प्रदीप मिश्रा ने कहा, “देरी के चलते अक्सर प्रॉपर्टी की वैल्यू से समझौता करना पड़ता है। ज्यादातर सुस्त प्रोजेक्ट्स में बुनियादी इन्फ्रास्ट्रक्चर पर भी सुस्ती से काम होता है। बड़े आवासीय परिसर के भीतर आधे-अधूरे भवन जैसी कई समस्याएं ऐसे प्रोजेक्ट्स के साथ जुड़ी होती हैं। इससे रेजिडेंट्स और अन्य संभावित खरीदारों के लिए समस्या हो सकती है।”
हाल के आदेश में, दिल्ली हाई कोर्ट ने बैंकों से क्रेडिट इन्फोर्मेशन ब्यूरो (इंडिया) से उन होमबायर्स का क्रेडिट बहाल करने के लिए कहने के निर्देश दिए हैं, जिन्होंने अधूरी या सुस्त परियोजनाओं के चलते ईएमआई देनी बंद कर दी थी। कोर्ट ने उन 1,200 होमबायर्स के मामले में यह आदेश दिया, जिनके प्रोजेक्ट्स सुस्त चल रहे हैं या अधूरे हैं। हालांकि, एक्सपर्ट्स ने अटके प्रोजेक्ट्स के होमबायर्स को अपनी ईएमआई बंद नहीं करने के लिए आगाह किया है।