अप्रेजल के बाद कई नौकरीपेशा लोगों को एक अजीब सा झटका लग चुका है या लगने वाला है। कंपनी ने 8% सैलरी बढ़ोतरी का लेटर तो दे दिया, लेकिन बैंक अकाउंट में पैसा पहुंचा सिर्फ 4-5% बढ़ा हुआ। यानी कागजों पर सैलरी ज्यादा दिखी, लेकिन हाथ में उतना फायदा नहीं आया। इसकी वजह है नया लेबर कोड सिस्टम, जिसके तहत कंपनियां अब सैलरी स्ट्रक्चर बदल रही हैं। नए नियमों में बेसिक सैलरी बढ़ाई जा रही है, जिससे PF और ग्रेच्युटी जैसी कटौतियां भी बढ़ रही हैं। यही कारण है कि इस बार अप्रेजल का पूरा फायदा कर्मचारियों की जेब तक नहीं पहुंच पा रहा।
अप्रेजल होने पर भी कम बढ़ेगी हाथ आने वाली सैलरी
दरअसल, सरकार के नए नियमों के मुताबिक अब किसी भी कर्मचारी की कुल सैलरी यानी CTC का कम से कम 50% हिस्सा बेसिक सैलरी माना जाएगा। इसी बेसिक के आधार पर PF, ग्रेच्युटी और दूसरी सुविधाओं का कैलकुलेशन होगा। पहले कई कंपनियां बेसिक सैलरी कम रखती थीं और बाकी पैसा अलग-अलग अलाउंस में देती थीं, जिससे कर्मचारियों की टेक-होम सैलरी ज्यादा रहती थी।
अब इसे एक आसान उदाहरण से समझिए..
मान लीजिए राहुल की कुल सैलरी (CTC) 50,000 रुपये महीना है। पहले उसकी बेसिक सैलरी 18,000 रुपये थी और बाकी पैसा अलाउंस में मिलता था। ऐसे में उसका PF कटता था करीब 2,160 रुपये। अब नए नियम लागू होने के बाद कंपनी ने उसकी बेसिक सैलरी बढ़ाकर 25,000 रुपये कर दी। इससे PF कटौती बढ़कर करीब 3,000 रुपये हो गई। यानी राहुल की सैलरी बढ़ी जरूर, लेकिन हर महीने हाथ में आने वाला पैसा कुछ हजार रुपये कम हो गया।
इसी तरह अगर किसी कर्मचारी की सैलरी में 10% बढ़ोतरी हुई है, तो जरूरी नहीं कि पूरा फायदा उसकी जेब में आए। बढ़ी हुई रकम का कुछ हिस्सा PF और ग्रेच्युटी में चला जाएगा।
उदाहरण के तौर पर अगर पूजा की सैलरी 60,000 रुपये थी और अप्रेजल के बाद 66,000 रुपये हो गई, तो उसे लगा होगा कि हर महीने 6,000 रुपये ज्यादा मिलेंगे। लेकिन नए स्ट्रक्चर में PF और दूसरी कटौतियां बढ़ने से हो सकता है कि उसके हाथ में सिर्फ 3,500 से 4,000 रुपये ही ज्यादा आएं।
यहां होगा कर्मचारियों को फायदा
हालांकि इसका एक फायदा भी है। PF और ग्रेच्युटी बढ़ने से कर्मचारियों की रिटायरमेंट सेविंग मजबूत होगी। यानी आज हाथ में पैसा थोड़ा कम मिलेगा, लेकिन भविष्य के लिए सेविंग ज्यादा बनेगी।
कुछ कंपनियां कर्मचारियों को राहत देने के लिए टैक्स बचाने वाले अलाउंस भी जोड़ रही हैं, जैसे मील कूपन, बच्चों की पढ़ाई का खर्च और हॉस्टल अलाउंस। इससे टैक्स थोड़ा कम हो सकता है। फिलहाल बड़ी कंपनियां तेजी से नए नियम लागू कर रही हैं, जबकि छोटी कंपनियां अभी इंतजार कर रही हैं। आने वाले महीनों में और भी कंपनियां कर्मचारियों की सैलरी स्ट्रक्चर में बदलाव कर सकती हैं। कुल मिलाकर अब सिर्फ सैलरी कितनी बढ़ी ये मायने नहीं रखेगा, बल्कि सैलरी का स्ट्रक्चर कैसे बदलेगा, ये समझना जरूरी है।