Silver vs gold: हाई लेवल से 48% नीचे चांदी, फिर भी सोने की चमक पर पड़ी भारी, जानें आखिर क्या है इसके पीछे की वजह
Silver vs Gold: भले ही इस साल सिल्वर की कीमत अपने हाई लेवल से काफी गिरी हो, लेकिन लंबे समय में चांदी, सोने से बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। फाइनेंस रिसर्च की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सिल्वर ने पिछले पांच सालों में 27% की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) हासिल की है, जिससे यह इस अवधि में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाला प्रमुख एसेट क्लास बन गया है
सिल्वर का इस्तेमाल कीमती मेटल में निवेश और इंडस्ट्री की मांग, दोनों में होता है, जिससे इसे एक अतिरिक्त सपोर्ट मिलता है। हालांकि गोल्ड के मामले में यह बात उतनी अहम नहीं है।
Silver vs Gold: भले ही इस साल सिल्वर की कीमत अपने हाई लेवल से काफी गिरी हो, लेकिन लंबे समय में चांदी, सोने से बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। फाइनेंस रिसर्च की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सिल्वर ने पिछले पांच सालों में 27% की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) हासिल की है, जिससे यह इस अवधि में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाला प्रमुख एसेट क्लास बन गया है। हालांकि, जनवरी में लगभग $122 तक पहुंचने के बाद, यह मेटल 2026 के अपने हाई लेवल से 48% नीचे आ गया है।
सिल्वर का इस्तेमाल कीमती मेटल में निवेश और इंडस्ट्री की मांग, दोनों में होता है, जिससे इसे एक अतिरिक्त सपोर्ट मिलता है। हालांकि गोल्ड के मामले में यह बात उतनी अहम नहीं है।
इंडस्ट्रियल मांग से मिलता है चांदी को बढ़ावा
दोनों मेटल्स के बीच सबसे बड़े अंतरों में से एक सिल्वर की मांग का पैटर्न है। टाटा म्यूचुअल फंड का कहना है कि सिल्वर को इलेक्ट्रॉनिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और हार्डवेयर के साथ-साथ सोलर सेक्टर में इसके इस्तेमाल से फायदा होता है। फंड हाउस को उम्मीद है कि ये इस्तेमाल लंबे समय तक मांग को सपोर्ट करेंगे, हालांकि कमजोर ग्लोबल इकोनॉमिक एक्टिविटी का असर निकट भविष्य में इंडस्ट्रियल खपत पर पड़ सकता है।
सप्लाई-डिमांड का संतुलन भी सपोर्टिव बना हुआ है। टाटा म्यूचुअल फंड के अनुसार, 2026 में लगातार छठे साल सिल्वर की कमी (डेफिसिट) रहने की उम्मीद है, क्योंकि मांग उपलब्ध सप्लाई से अधिक होगी।
मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज ने भी सिल्वर की लगातार इंडस्ट्रियल मांग को इस कीमती मेटल के आउटलुक को सपोर्ट करने वाले कारकों में से एक बताया है। 2026 की पहली छमाही पर इसकी रिपोर्ट में सिल्वर मार्केट में इंडस्ट्रियल मांग के जरिए चीन की अहम भूमिका पर प्रकाश डाला गया है, साथ ही व्यापक कीमती-मेटल मार्केट में भी उसकी बड़ी भूमिका बताई गई है।
चीन की भूमिका भी है अहम
सिल्वर सप्लाई चेन में चीन की बड़ी मौजूदगी है। टाटा म्यूचुअल फंड ने कहा कि ग्लोबल सिल्वर रिजर्व में इस देश की हिस्सेदारी लगभग 11% है और रिफाइनिंग क्षमता का 60-70% हिस्सा इसके नियंत्रण में है। फंड हाउस ने कहा कि चीन की रिफाइनिंग पाबंदियों से ग्लोबल सिल्वर सप्लाई चेन में रुकावटें आ सकती हैं। यह तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब इंडस्ट्रियल मांग मजबूत बनी रहे और उपलब्ध सप्लाई कम हो।
इंडस्ट्रियल इस्तेमाल और केंद्रित रिफाइनिंग क्षमता का मेल सिल्वर को सप्लाई-साइड की एक अतिरिक्त कमजोरी देता है, जो गोल्ड के मामले में उतनी अहम नहीं है।
गोल्ड का मॉनेटरी डिमांड बेस मजबूत है
इसके विपरीत, गोल्ड को सेंट्रल बैंकों, रिजर्व में विविधता लाने और सुरक्षित निवेश (सेफ-हेवन) के तौर पर अपनी भूमिका से सपोर्ट मिलता रहता है। टाटा म्यूचुअल फंड के अनुसार, वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के जुलाई 2026 के सर्वे से पता चला है कि सेंट्रल बैंक को उम्मीद है कि अगले 12 महीनों में ग्लोबल गोल्ड रिज़र्व बढ़ेंगे। चीन ने भी अपने रिजर्व में सोना जोड़ना जारी रखा है और मई तक लगातार 20 महीनों से सोना खरीद रहा है।
मोतीलाल ओसवाल ने कहा कि 2026 की दूसरी छमाही में सोने और चांदी के लिए सेंट्रल बैंक की मांग, इन्वेस्टमेंट फ्लो, ग्लोबल लिक्विडिटी और US ब्याज दरों की दिशा महत्वपूर्ण बनी रहेगी।
हालांकि, ब्रोकरेज ने कहा कि ज़्यादा रियल यील्ड सोने के लिए एक बड़ी बाधा बन गई है, जिससे जियोपॉलिटिकल तनाव के बावजूद इसकी पारंपरिक 'सेफ-हेवन' (सुरक्षित निवेश) वाली अपील सीमित हो गई है।
आगे इंडस्ट्रियल मांग में सुधार चांदी की बढ़ाएगी और चमक
अगर ग्लोबल आर्थिक स्थितियों में सुधार होता है तो मांग के कारकों में अंतर और भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
टाटा म्यूचुअल फंड ने कहा कि अगर फेडरल रिज़र्व को लेकर चिंताएं कम होती हैं और इंडस्ट्रियल मांग में सुधार होता है, तो चांदी सोने से बेहतर प्रदर्शन कर सकती है। इस बदलाव से गोल्ड-सिल्वर रेश्यो भी कम हो जाएगा।
जुलाई में यह रेश्यो लगभग 68 था, जो इसके लंबे समय के औसत के करीब है। इससे पहले 2026 की शुरुआत में यह 80 से ऊपर चला गया था, क्योंकि निवेशकों ने जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता और US ब्याज दरों को लेकर चिंताओं के बीच सोने को प्राथमिकता दी थी।
अगर आर्थिक गतिविधि और मैन्युफैक्चरिंग मांग में सुधार होता है, तो चांदी को इन्वेस्टमेंट फ्लो और ज़्यादा इंडस्ट्रियल खपत दोनों से फायदा हो सकता है। वहीं, सोना मॉनेटरी पॉलिसी, रियल यील्ड, डॉलर और सेंट्रल बैंक की मांग पर ज़्यादा निर्भर रहेगा।
चांदी में वौलेटिलिटी ज्यादा
चांदी का मजबूत लॉन्ग-टर्म प्रदर्शन आर्थिक चक्रों के प्रति ज़्यादा संवेदनशीलता के साथ आता है।टाटा म्यूचुअल फंड को उम्मीद है कि शॉर्ट टर्म में चांदी में स्थिरता (कंसोलिडेशन) बनी रहेगी क्योंकि कमजोर ग्लोबल आर्थिक स्थितियों का असर इंडस्ट्रियल मांग पर पड़ रहा है। सोलर से जुड़ी चांदी की मांग में कमी और लॉन्ग पोजीशन की लिक्विडेशन ने भी पहले देखी गई सप्लाई की कमी को कुछ हद तक कम किया है।
इसी तरह, मोतीलाल ओसवाल को उम्मीद है कि 2026 की दूसरी छमाही में दोनों धातुओं के लिए मैक्रो-इकोनॉमिक कारक महत्वपूर्ण बने रहेंगे, जिनमें महंगाई, फेडरल रिज़र्व की पॉलिसी, ग्लोबल लिक्विडिटी, चीन की रिज़र्व रणनीति, सेंट्रल बैंक की मांग, ETF फ्लो और सट्टा पोजीशनिंग शामिल हैं। मांग के अलग-अलग प्रोफाइल यह बताते हैं कि क्यों चांदी इंडस्ट्रियल गतिविधि में सुधार के समय सोने से बेहतर प्रदर्शन कर सकती है, लेकिन विकास की उम्मीदें कम होने पर इसमें ज़्यादा तेज़ी से गिरावट भी आ सकती है।
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