कई महीनों की कमजोरी के बाद स्टॉक मार्केट में रौनक लौट आई है। इनवेस्टर्स खरीदारी में दिलचस्पी दिखाने लगे हैं। सवाल है कि बाजार की मौजूदा स्थितियों में 10 लाख रुपये का निवेश कहां करने से मोटी कमाई हो सकती है? मनीकंट्रोल ने इस सवाल का जवाब Tata Mutual Fund की फंड मैनेजर Meeta Shetty से जानने की कोशिश की। हमने ग्लोबल और इंडियन स्टॉक मार्केट की आगे की दिशा के बारे में उनसे पूछा। शेट्टी अभी छह फंडों का प्रबंधन कर रही हैं, जिनका कुल एसेट अंडर मैनेजमेंट 12,363 करोड़ रुपये है।
2023 में बाजार के सीमित दायरे में रहने की उम्मीद
शेट्टी ने इंडियन स्टॉक मार्केट के बारे में कहा कि 2023 में ऐसा साल है, जिसमें बाजार सीमित दायरे में रहेंगे। हमें पिछले साल जैसी स्थितियां देखने को मिल सकती हैं। उतार-चढ़ाव भी थोड़ा ज्यादा दिख सकता है। ऐसे में हमारी सलाह यह है कि इनवेस्टर्स को बैलेंस्ड एडवान्टेज फंड में निवेश करना चाहिए। इसके बाद ऐसे फंड्स में निवेश करना ठीक रहेगा, जो आपको अलग-अलग मार्केट कैपिटलाइजेशन की कंपनियों में पैसे लगाने में मदद करता हो। मेरा मतलब लार्जकैप, मिडकैप और स्मॉलकैप से है। इसलिए फ्लेक्सी कैप या मल्टीकैप फंड सही दिख रहे हैं। ये फंड अपने एसेट को मिडकैप और स्मॉलकैप में भी रिएलोकेट कर सकते हैं। इससे अल्फा रिटर्न हासिल करने में मदद मिलेगी।
ग्लोबल इकोनॉमी को लेकर दिख रहा रिस्क
उन्होंने कहा कि जहां तक इंडिया की बात है तो चीजें अच्छी दिख रही हैं। बैंकों का प्रदर्शन अच्छा है। कॉर्पोरेट इंडिया की सेहत भी अच्छी है। लंबे समय के बाद प्राइवेट इनवेस्टमेंट अब शुरू होने जा रहा है। हालाांकि, कुछ चुनौतियां दिख रही हैं। अगर मॉनसून सामान्य से कमजोर रहता है तो कुछ रिस्क पैदा हो सकता है। हमें इनफ्लेशन के आंकड़ों पर भी नजर रखनी होगी। मुझे ज्यादा रिस्क ग्लोबल इकोनॉमी की तरफ से दिख रहा है। यह देखना होगा कि ग्लोबल इकोनॉमी में किस तरह स्थिरता आती है। वहां इंटरेस्ट रेट वृद्धि पर कब ब्रेक लगने जा रहा है और रिसेशन कितनी गहरी होने जा रही है।
आईटी कंपनियों को नहीं होगी दिक्कत
शेट्टी ने आईटी कंपनियों के बारे में कहा कि जहां तक इंडियन आईटी कंपनियों का सवाल है तो कोई बड़ी दिक्कत नहीं दिख रही है। हम कह सकते हैं कि इंडिया में कॉन्ट्रैक्ट या डील की कॉस्ट कम है। इसलिए इंडिया जैसे देशों को फायदा मिल सकता है जहां से काम आउटसोर्स होता है। पहले भी हमने देखा है कि जब कभी ग्लोबल इकोनॉमी में स्लोडाउन की स्थिति बनती है तब इंडिया जैसे देशों से आउटसोर्सिंग बढ़ी है। हम 2008 के ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस का उदाहरण ले सकते हैं। ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस के बाद आउटसोर्सिंग में बड़ा उछाल देखने को मिला था।