बीमा सबकी जरूरत, फिर भी आबादी का बड़ा हिस्सा इससे दूर; जानिए क्या है इसकी वजह

भारत में मेडिकल खर्च तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन हैरानी की बात है कि अब भी बड़ी आबादी बीमा से बाहर है। आखिर लोग जरूरत जानते हुए भी पॉलिसी क्यों नहीं लेते? महंगे प्रीमियम और जटिल शर्तों की असली कहानी जानिए एक्सपर्ट से।

अपडेटेड Feb 16, 2026 पर 3:35 PM
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बीते कुछ सालों में ऑनलाइन चैनलों के जरिए बीमा खरीदने का चलन तेजी से बढ़ा है।

भारत में हेल्थ और टर्म इंश्योरेंस की अहमियत आज किसी से छिपी नहीं है। मेडिकल खर्च लगातार बढ़ रहे हैं, लाइफस्टाइल बीमारियां आम हो चुकी हैं। ऐसे में परिवार की वित्तीय सुरक्षा पहले से ज्यादा जरूरी हो गई है। इसके बावजूद एक बड़ी आबादी अब भी बीमा से बाहर है। वजह साफ है- महंगा प्रीमियम और जटिल पॉलिसी स्ट्रक्चर।

नेशनल इंश्योरेंस एकेडमी की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में केवल लगभग 5% आबादी के पास जीवन बीमा कवरेज है। इसका मतलब कि बाकी 95% बीमा कवरेज से बाहर हैं। वहीं, हेल्थ इंश्योरेंस की बात करें तो यह 37% लोगों के पास है।

इंडस्ट्री डेटा भी यही संकेत देता है कि मांग बढ़ने के बावजूद अंडर इंश्योरेंस एक बड़ी समस्या बनी हुई है। लोग बीमा लेना चाहते हैं, लेकिन जब प्रीमियम उनकी मासिक आय या बजट से मेल नहीं खाता, तो फैसला टल जाता है।


सरल योजनाओं से बनेगा पहला भरोसा

EDME Insurance Brokers Ltd. के एमडी और इंडस्ट्री स्पेशलिस्ट नोचिकेता दीक्षित (Nochiketa Dixit) मानते हैं कि बीमा को आम लोगों तक पहुंचाने की शुरुआत सिंपल प्रोडक्ट्स से ही हो सकती है।

उनका कहना है, 'महंगा प्रीमियम लोगों को बीमा से दूर करता है। आसान और कम प्रीमियम वाली योजनाएं पहली बार बीमा लेने वालों के लिए एंट्री पॉइंट बन सकती हैं।'

दीक्षित के मुताबिक, जब पॉलिसी समझना आसान होती है और शर्तें साफ होती हैं, तो ग्राहक का भरोसा बनता है। यही भरोसा आगे चलकर ज्यादा कवरेज और बड़ी योजनाओं की ओर ले जाता है। यानी सिंपल प्लान सिर्फ सस्ता विकल्प नहीं, बल्कि लॉन्ग टर्म ग्रोथ की नींव है।

ज्यादा फीचर्स, ज्यादा भ्रम, ज्यादा प्रीमियम

Elephant.in से जुड़े Alliance Insurance Brokers के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट चेतन वासुदेवा इस समस्या की जड़ को पॉलिसी डिजाइन से जोड़ते हैं। उनका कहना है, 'जरूरत से ज्यादा ऐड ऑन, जटिल कवरेज और लंबे नियम पॉलिसी को महंगा बना देते हैं।'

चेतन मानते हैं कि आज का ग्राहक ज्यादा क्लैरिटी चाहता है। उसे यह जानना है कि किस रिस्क के लिए वह पैसा दे रहा है। सीमित लेकिन जरूरी कवरेज वाली योजनाएं इसी वजह से लोकप्रिय हो रही हैं, क्योंकि इनमें प्रीमियम भी काबू में रहता है और भ्रम भी कम होता है।

हेल्थ और टर्म इंश्योरेंस में अब ट्रेंड साफ है- कम दिखावा, ज्यादा काम का कवरेज। यही अप्रोच बड़े पैमाने पर बीमा अपनाने में मदद कर सकती है।

डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने बदला गेम

बीते कुछ सालों में ऑनलाइन चैनलों के जरिए बीमा खरीदने का चलन तेजी से बढ़ा है। इसकी वजह सिर्फ सुविधा नहीं, बल्कि पारदर्शिता भी है।

ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर पॉलिसी की शर्तें साफ दिखती हैं, तुलना आसान होती है और क्लेम प्रोसेस पहले से तेज हुआ है। इसका सीधा असर भरोसे पर पड़ा है। डिजिटल डिस्ट्रीब्यूशन ने न सिर्फ लागत घटाई है, बल्कि उन लोगों तक भी बीमा पहुंचाया है, जो पहले एजेंट या जटिल प्रक्रियाओं से घबराते थे।

SME के लिए कस्टमाइजेशन क्यों जरूरी

बीमा कवच के फाउंडर और सीईओ तेजस जैन का फोकस खास तौर पर छोटे और मध्यम व्यवसायों पर है। उनका कहना है, 'जब बीमा योजनाओं को जरूरत के हिसाब से कस्टमाइज किया जाता है, तो जरूरी जोखिम कवर होते हैं और गैर जरूरी खर्च हट जाते हैं।'

जैन का मानना है कि टेक्नोलॉजी की मदद से अंडरराइटिंग, ऑनबोर्डिंग और क्लेम प्रोसेस तेज होता है, जिससे लागत घटती है। यह एसएमई सेक्टर के लिए बेहद अहम है, जहां हर अतिरिक्त खर्च सीधे मुनाफे पर असर डालता है। सरल, लचीली और जरूरत आधारित पॉलिसियां ही इस सेगमेंट में बीमा की पैठ बढ़ा सकती हैं।

आखिर कैसे बढ़ेगी बीमा की पहुंच?

इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स की राय एक सुर में यही कहती है कि बीमा कंपनियों को अब प्रोडक्ट सिंप्लिफिकेशन पर गंभीरता से काम करना होगा। कम शर्तें, साफ कवरेज, किफायती प्रीमियम और टेक्नोलॉजी आधारित प्रोसेस- यही वह कॉम्बिनेशन है जो बीमा को एलीट प्रोडक्ट से मास प्रोडक्ट बना सकता है।

एक्सपर्ट के मुताबिक, अगर बीमा को हर घर तक पहुंचाना है, तो उसे समझने में आसान, खरीदने में सस्ता और इस्तेमाल में भरोसेमंद बनाना ही होगा। यही महंगे प्रीमियम की समस्या का सबसे टिकाऊ समाधान है।

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