राजपाल यादव को जेल! जानिए क्या हैं लोन चुकाने और चेक बाउंस के नियम, कब होती है सजा
Cheque Bounce Law: राजपाल यादव को चेक बाउंस मामले में 6 महीने की सजा मिली है। जानिए लोन न चुकाने और चेक बाउंस के कानून क्या कहते हैं, कब जेल हो सकती है और किन नियमों का ध्यान रखना जरूरी है।
1881 का Negotiable Instruments Act यह साफ बताता है कि चेक बाउंस कब अपराध माना जाएगा
Cheque Bounce Law: बॉलीवुड के मशहूर कॉमेडियन राजपाल यादव को चेक बाउंस के मामले में 6 महीने के जेल हुई है। राजपाल के खिलाफ यह मामला फिल्म 'अता-पता-लापता' से जुड़ा है। साल 2010 में मुरली प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी ने इस फिल्म के लिए करीब पांच करोड़ रुपये दिए थे।
राजपाल यादव ने कर्ज के भुगतान के लिए कंपनी को कई चेक दिए, जो बाउंस हो गए। इसके कारण उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया। इसके बाद 2018 में दिल्ली की निचली अदालत ने राजपाल यादव को दोषी ठहराते हुए छह महीने की जेल की सजा सुनाई थी।
चेक आज भी पैसे देने और लेने का एक भरोसेमंद तरीका माना जाता है, लेकिन जब खाते में पर्याप्त बैलेंस नहीं होता तो चेक बाउंस हो जाता है। भारत में चेक बाउंस के मामले अब भी बड़ी संख्या में अदालतों तक पहुंचते हैं।
1881 का Negotiable Instruments Act यह साफ बताता है कि चेक बाउंस कब अपराध माना जाएगा, शिकायत कैसे दर्ज होगी और किसकी क्या जिम्मेदारी होगी। इसकी धारा 138 से 143A तक सजा, जिम्मेदारी और ट्रायल की पूरी प्रक्रिया तय की गई है।
क्या लोन न चुकाने पर जेल हो सकती है?
सिर्फ लोन न चुका पाने पर सीधे जेल नहीं होती, क्योंकि सामान्य तौर पर यह सिविल मामला माना जाता है, आपराधिक अपराध नहीं। बैंक या फाइनेंस कंपनी आमतौर पर रिकवरी की कानूनी प्रक्रिया, नोटिस, सिविल मुकदमा या सिक्योरिटी जब्त करने का रास्ता अपनाती है।
लेकिन अगर लोन लेते समय धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज, जानबूझकर पैसा न लौटाने की साजिश या चेक बाउंस जैसी स्थिति बनती है, तो मामला आपराधिक धाराओं में जा सकता है। ऐसी स्थिति में जेल भी हो सकती है। जैसा कि राजपाल यादव के मामले में हुआ है।
चेक बाउंस कब अपराध बनता है?
अगर कोई व्यक्ति अपने बैंक खाते से किसी दूसरे व्यक्ति को कर्ज या किसी देनदारी के भुगतान के लिए चेक देता है, तो खाते में पर्याप्त रकम होनी चाहिए। अगर चेक दो वजहों से वापस आ जाता है तो यह आपराधिक अपराध है। पहला खाते में पर्याप्त पैसा न होना और दूसरा बैंक से तय सीमा से ज्यादा रकम लिखी होना।
लेकिन इसके लिए कुछ शर्तें पूरी होना जरूरी है। चेक जारी होने की तारीख से छह महीने के भीतर या उसकी वैधता अवधि के भीतर, जो पहले हो, बैंक में पेश किया जाना चाहिए। बैंक से चेक बाउंस की जानकारी मिलने के 30 दिनों के भीतर भुगतान पाने वाले को लिखित नोटिस भेजकर पैसे की मांग करनी होती है। इसके बाद भी अगर चेक देने वाला व्यक्ति नोटिस मिलने के 15 दिनों के भीतर भुगतान नहीं करता, तभी मामला बनता है।
अगर दोष साबित होता है, तो दो साल तक की जेल, या चेक रकम के दोगुने तक जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं।
कानून भुगतान पाने वाले के पक्ष में क्यों खड़ा है?
कानून यह मानकर चलता है कि चेक किसी कर्ज या देनदारी को चुकाने के लिए ही दिया गया था, जब तक कि चेक जारी करने वाला इसके उलट साबित न कर दे।
बैंक की स्लिप या मेमो, जिस पर चेक बाउंस होने का आधिकारिक निशान हो, उसे अदालत में शुरुआती सबूत माना जाता है।
धारा 140 यह साफ करती है कि यह कहकर बचाव नहीं किया जा सकता कि चेक देने वाले को अंदाजा नहीं था कि चेक बाउंस हो जाएगा।
इन नियमों का मतलब यह है कि अदालत में अपनी बेगुनाही साबित करने की जिम्मेदारी चेक जारी करने वाले पर होती है।
कंपनी ने चेक दिया तो कौन जिम्मेदार होगा?
अगर किसी कंपनी का चेक बाउंस होता है, तो सिर्फ कंपनी ही नहीं बल्कि उस समय कंपनी के कामकाज के लिए जिम्मेदार लोग भी दोषी माने जाएंगे। कोई व्यक्ति तभी बच सकता है जब वह साबित कर दे कि यह गलती उसकी जानकारी के बिना हुई या उसने इसे रोकने के लिए पूरी सावधानी बरती थी।
इस धारा के तहत 'कंपनी' में फर्म और अन्य समूह भी शामिल हैं। 'डायरेक्टर' में फर्म के पार्टनर भी आते हैं। हालांकि सार्वजनिक कंपनियों के सरकारी नामित डायरेक्टर को इससे छूट दी गई है।
चेक बाउंस की शिकायत कैसे दर्ज होती है?
धारा 138 के तहत मामला तभी चलेगा जब भुगतान पाने वाला या वैध धारक लिखित शिकायत दर्ज करे। आमतौर पर शिकायत 15 दिन की अवधि खत्म होने के बाद एक महीने के भीतर दर्ज करनी होती है। अगर देरी हो जाए तो अदालत उचित कारण होने पर देरी माफ कर सकती है।
इन मामलों की सुनवाई केवल महानगरीय मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट कर सकते हैं। धारा 142A यह भी सुनिश्चित करती है कि एक ही व्यक्ति के खिलाफ कई मामले हों तो उन्हें एक ही अदालत में सुना जाए, ताकि फैसलों में एकरूपता बनी रहे। जरूरत पड़ने पर लंबित मामलों को ट्रांसफर भी किया जा सकता है।
ट्रायल की प्रक्रिया और अंतरिम मुआवजा?
चेक बाउंस के मामलों की सुनवाई आमतौर पर तेज प्रोसेस से की जाती है ताकि फैसला जल्दी हो सके। आदर्श रूप से छह महीने के भीतर ट्रायल पूरा होना चाहिए। छोटे ट्रायल में एक साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है। अगर मामला जटिल हो तो मजिस्ट्रेट इसे सामान्य ट्रायल में बदल सकता है।
धारा 143A के तहत अदालत आरोपी को चेक राशि का 20 प्रतिशत तक अंतरिम मुआवजा देने का आदेश दे सकती है। यह रकम 60 दिनों के भीतर देनी होती है। पर्याप्त कारण होने पर 30 दिन की अतिरिक्त मोहलत मिल सकती है।
अगर आरोपी बरी हो जाता है, तो शिकायतकर्ता को यह अंतरिम मुआवजा भारतीय रिजर्व बैंक की बैंक दर के अनुसार ब्याज सहित लौटाना होता है। यह अंतरिम मुआवजा आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 421 के तहत जुर्माने की तरह वसूला जा सकता है।
क्या जेल जाने से चेक बाउंस और लोन खत्म हो जाता है?
जेल जाने से चेक बाउंस का मामला या लोन अपने आप खत्म नहीं हो जाता। चेक बाउंस में सजा आपराधिक जिम्मेदारी के तहत मिलती है, लेकिन चेक की रकम और मूल देनदारी अलग मुद्दा है। अगर अदालत सजा देती है, तब भी भुगतान की जिम्मेदारी बनी रहती है। जुर्माना, मुआवजा या समझौता होने तक रकम चुकानी पड़ सकती है।
इसी तरह, लोन न चुकाने पर अगर किसी कारण से आपराधिक मामला बन भी जाए और जेल हो जाए, तब भी बैंक का पैसा माफ नहीं होता। बैंक सिविल रिकवरी, संपत्ति जब्ती या अन्य कानूनी तरीकों से वसूली जारी रख सकता है। यानी जेल सजा है, कर्ज का खात्मा नहीं।