बकरीद, जिसे ईद-उल-अजहा या ईद-ए-कुर्बां के नाम से जाना जाता है, इस्लाम धर्म का एक प्रमुख त्योहार है जो त्याग, समर्पण और अल्लाह के प्रति अटूट श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है। ये पर्व इस्लामी कैलेंडर के बारहवें महीने जू अल-हिज्जा की 10वीं तारीख को मनाया जाता है, जिसकी तिथि हर साल चांद के दिखने पर निर्भर करती है। इस दिन मुस्लिम समुदाय के लोग सुबह विशेष नमाज अदा करते हैं और उसके बाद कुर्बानी की परंपरा निभाई जाती है, जो हजरत इब्राहिम की उस ऐतिहासिक घटना की याद दिलाती है।
जब उन्होंने अल्लाह के हुक्म पर अपने सबसे प्रिय पुत्र की कुर्बानी देने का निश्चय किया था। बकरीद पर लोग जरूरतमंदों की मदद करते हैं, उपहारों का आदान-प्रदान करते हैं और एकता व भाईचारे का संदेश देते हैं। यह पर्व आस्था, सेवा और इंसानियत की मिसाल है।
सुबह की नमाज से होती है शुरुआत
बकरीद की शुरुआत विशेष ईद की नमाज से होती है। ये नमाज मस्जिदों, ईदगाहों और खुले मैदानों में पढ़ी जाती है। इसमें दो रकात होती हैं और हर रकात में तकबीर (अल्लाह-उ-अकबर) को सात बार दोहराया जाता है। इस नमाज के जरिए लोग खुदा का शुक्रिया अदा करते हैं और अपने लिए व समाज के लिए दुआ करते हैं।
आपके शहर में कितने बजे है बकरीद की नमाज?
देश के अलग-अलग शहरों में सूर्योदय के अनुसार नमाज का समय थोड़ा अलग होता है। यहां देखें कुछ प्रमुख शहरों का समय:
दिल्ली: सुबह 6:00 से 6:20 बजे
मुंबई: सुबह 6:15 से 6:35 बजे
लखनऊ: सुबह 5:55 से 6:15 बजे
बेंगलुरु: सुबह 6:10 से 6:30 बजे
क्यों दी जाती है कुर्बानी?
इस त्योहार के पीछे एक बेहद प्रेरणादायक कहानी जुड़ी है। माना जाता है कि हजरत इब्राहिम को अल्लाह ने आजमाने के लिए आदेश दिया कि वे अपनी सबसे प्रिय चीज की कुर्बानी दें। उनके लिए ये सबसे प्यारी चीज उनके बेटे हजरत इस्माइल थे। अल्लाह के आदेश को मानते हुए उन्होंने आंखों पर पट्टी बांधकर अपने बेटे की कुर्बानी देने का प्रयास किया। जब पट्टी हटाई, तो देखा कि उनके बेटे की जगह एक दुंबा (बकरा) कुर्बान हो चुका था और उनका बेटा सुरक्षित खड़ा था। इस घटना के प्रतीक के तौर पर आज भी बकरीद पर बकरे की कुर्बानी दी जाती है।
नमाज और कुर्बानी के बाद लोग एक-दूसरे को गले लगाकर ईद की मुबारकबाद देते हैं। बच्चे और घर के छोटे सदस्य ईदी यानी तोहफे या पैसे पाते हैं। इसके अलावा जरूरतमंदों में भोजन, कपड़े और पैसे बांटे जाते हैं, जिससे इस त्योहार का परोपकार भाव और अधिक गहराता है।
बकरीद सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि ये त्याग, सेवा और समर्पण की भावना को जीवंत करता है। ये हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति वही है जो बिना स्वार्थ के की जाए और दूसरों की भलाई के लिए कुछ त्याग करने को तैयार रहे। इस बकरीद पर, हम सभी को खुदा के इस संदेश को अपनाकर एक-दूसरे की मदद करने का संकल्प लेना चाहिए।