भड़ली नवमी के ठीक दो दिन बाद 'देवशयनी एकादशी' आती है, जिससे चातुर्मास की शुरुआत होती है। मान्यता है कि देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चार महीने के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार, इस अवधि में विवाह, मुंडन, जनेऊ या गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते क्योंकि इस दौरान उनका प्रत्यक्ष आशीर्वाद नहीं मिल पाता। इसलिए, भड़ली नवमी को विवाह और अन्य शुभ कार्यों के लिए सीजन का आखिरी दिन मानकर धूमधाम से मनाया जाता है। इसके अलावा, इसके बाद भगवान विष्णु अगले चार महीनों के लिए विश्राम अवस्था में चले जाते हैं, इसलिए श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। लोग व्रत रखते हैं, मंदिरों में जाते हैं और आने वाले चार महीनों के लिए भगवान का संरक्षण व आशीर्वाद मांगते हैं। यह दिन आषाढ़ गुप्त नवरात्रि का अंतिम दिन भी होता है। इस वजह से तांत्रिक और आध्यात्मिक साधना करने वाले लोगों के लिए मां दुर्गा (शक्ति) की पूजा करने और हवन अनुष्ठान संपन्न करने के लिहाज से यह बेहद पवित्र तिथि मानी जाती है।