Bhaum Pradosh Vrat 2025 Katha: हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का बहुत महत्व है। भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित ये व्रत प्रत्येक हिंदू माह में दो बार आता है। एक बार कृष्ण पक्ष में और एक बार शुक्ल पक्ष में। इस व्रत का महत्व इस बात से और भी बढ़ जाता है, ये किसी दिन किया जा रहा है। जैसे शनिवार को पड़ने वाला प्रदोष व्रत शनि प्रदोष होता है और सोमवार को पड़ने वाला सोम प्रदोष व्रत होता है। प्रदोष व्रत जब मंगलवार के दिन पड़ता है तो इसे भौम प्रदोष व्रत कहते हैं। इस दिन माता पार्वती और भगवान शिव के साथ ही हनुमान ही की भी पूजा की जाती है। प्रदोष व्रत हर महीने की त्रयोदशी तिथि को किया जाता है।
पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष या अगहन महीने के शुक्ल पक्ष की त्रयदशी तिथि 2 दिसंबर को दोपहर 03.57 पर शुरू होगी और 3 दिसंबर को दोपहर 12.25 पर समाप्त हो जाएगी। प्रदोष व्रत की पूजा प्रदोष काल में की जाती है। इसलिए भौम प्रदोष व्रत की पूजा भी मंगलवार 2 दिसंबर 2025 को मान्य रहेगी।
भौम प्रदोष व्रत पर 3 शुभ योग
सर्वाथ सिद्धि योग- 2 दिसंबर को सुबह 06.57 से रात 08.51 तक
रवि योग- 2 दिसंबर को रात 08.51 से देर रात 01.22 तक रहेगा
भौम प्रदोष व्रत पर पूजा के लिए 2 दिसंबर 2025 को शाम 5 बजकर 24 मिनट से लेकर रात 8 बजकर 7 मिनट तक रहेगा। शिव पूजन के लिए कुल 2 घंटे 43 मिनट का समय मिलेगा।
बहुत समय पहले एक नगर में एक वृद्ध महिला रहती थी, जिसका एक ही पुत्र था। वह हनुमान जी की परम भक्त थी और हर मंगलवार नियमपूर्वक व्रत करके हनुमान जी की पूजा करती थी। एक दिन हनुमान जी उसकी परीक्षा लेने के लिए साधु का रूप धारण करके उसके घर पहुंचे। उन्होंने आवाज लगाई “क्या कोई हनुमान भक्त है जो हमारी एक इच्छा पूरी कर सके?”
यह सुनकर वृद्धा तुरंत बाहर आई और आदरपूर्वक बोली “महाराज, बताइए आपके लिए क्या कर सकती हूं?” साधु वेश में हनुमान जी बोले “मैं भूखा हूं। भोजन करना चाहता हूं। पहले थोड़ी जमीन लीप दो।” वृद्धा असमंजस में पड़ गई और हाथ जोड़कर बोली “महाराज, मिट्टी लीपना मेरे बस की बात नहीं है। कृपया कोई और सेवा बताएं, मैं जरूर करूंगी।”
साधु ने उससे तीन बार प्रतिज्ञा करवाई और बोले “अपने बेटे को बुलाओ। मैं उसकी पीठ पर आग जलाकर भोजन तैयार करूंगा।” यह सुनकर वृद्धा घबरा गई, लेकिन वह वचन दे चुकी थी, इसलिए वह अपने पुत्र को साधु के हवाले कर आई। इसके बाद हनुमान जी ने वृद्धा से ही उसके पुत्र को पेट के बल लिटवाया और उसकी पीठ पर अग्नि प्रज्वलित कर भोजन पकाया। दुखी मन से वृद्धा घर के भीतर चली गई।
भोजन तैयार होने पर साधु ने उसे बुलाकर कहा “भोजन बन चुका है, अब अपने पुत्र को बुलाओ। वह भी प्रसाद ग्रहण करे।” वृद्धा ने रोते हुए कहा “महाराज, उसके नाम से भी मेरा हृदय दुखता है।” लेकिन साधु के आग्रह पर उसने अपने पुत्र को पुकारा और आश्चर्य! उसका पुत्र सुरक्षित खड़ा था। पुत्र को जीवित देखकर वृद्धा कृतज्ञता से साधु के चरणों में गिर पड़ी। तभी हनुमान जी ने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट किया और उसे अखंड भक्ति का वरदान दिया।