Bhaumvati Amavasya 2026: हिंदू धर्म में अमावसया तिथि का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन श्रद्धालु गंगा आदि पवित्र नदियों में स्नान करते हैं, दान-पुण्य और पितरों के लिए श्राद्ध-तर्पण करते हैं। शास्त्रों में 1000 सोमवती अमावस्या से बढ़कर भौमवती अमावस्या मानी गई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भौमवती अमावस्या के दिन सुबह के समय गंगा स्नान करने वाले श्रद्धालुओं को उसका अनंत फल मिलता है। आषाढ़ अमावस्या को हलहारिणी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन ‘सोना धोबिन और एक ब्राह्मण कन्या’ की पौराणिक कथा सुनना भी बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। आइए जानें इसके बारे में।
बहुत समय पहले एक गरीब ब्राह्मण अपने परिवार के साथ रहता था। उसके परिवार में पति-पत्नी के अलावा एक सुंदर और संस्कारी बेटी थी। समय के साथ कन्या बड़ी होने लगी। लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उसका विवाह नहीं हो पा रहा था। कन्या के माता-पिता इस चिंता में रहते थे। एक दिन उनके घर एक संत-महात्मा का आगमन हुआ। कन्या ने श्रद्धापूर्वक उनकी सेवा की। कन्या के व्यवहार से प्रसन्न होकर साधु ने उसे खूब आशीर्वाद दिया।
लेकिन ध्यान करने के बाद उन्होंने बताया कि कन्या की हथेली में विवाह की रेखा नहीं है। तब ब्राह्मण दम्पति ने साधु से इसका उपाय पूछा। साधु ने बताया कि पास के गांव में 'सोना' नाम की एक धोबिन रहती है, जो अपने पति के प्रति समर्पित, धर्मपरायण और अच्छे संस्कारों वाली महिला है। यदि यह कन्या उसकी सेवा करे और विवाह के समय सोना धोबिन अपनी मांग का सिंदूर इस कन्या की मांग में लगाए, तो उसके जीवन का संकट दूर हो सकता है।
कन्या ने शुरू किया साधु का बताया उपाय
साधु की बात मानकर ब्राह्मण की पुत्री नियम और लगन से धोबिन की सेवा करने लगी। कई दिनों तक ऐसा चलता रहा। एक दिन सोना धोबिन ने अपनी बहू से पूछा कि वह रोज सुबह इतनी जल्दी सारे काम कैसे कर लेती है। बहू ने कहा कि उसे तो लगता है कि यह काम वो करती है। सास-बहू ने पता लगाने का निश्चय किया। एक दिन उन्होंने देखा कि सुबह अंधेरे में एक कन्या उनके घर आती है और सभी काम करके वापस चली जाती है। एक दिन सोना धोबिन ने उसे रोक लिया और उसके चरणों में गिरकर पूछा कि वह कौन है और बिना बताए उनकी सेवा क्यों करती है। तब कन्या ने साधु द्वारा बताए गए उपाय और अपनी परेशानी के बारे में सब कुछ बता दिया।
सोना धोबिन कन्या की सहायता के लिए तैयार हो गई। उस समय उसके पति की तबीयत खराब थी। उसने अपनी बहू से कहा कि जब तक वह वापस न आए, तब तक वह घर संभाले। जब सोना धोबिन ने कन्या की मांग में अपना सिंदूर लगाया, उसी समय उसके पति का निधन हो गया। उसे इस बात का आभास हो गया। वह बिना जल ग्रहण किए घर से निकल पड़ी और मन में संकल्प लिया कि रास्ते में यदि पीपल का पेड़ मिला तो वह उसकी पूजा और परिक्रमा करने के बाद ही जल ग्रहण करेगी। संयोग से उस दिन अमावस्या थी। रास्ते में मिले पीपल के पेड़ की उसने श्रद्धापूर्वक पूजा की और 108 बार परिक्रमा की। मान्यता है कि उसकी भक्ति और पतिव्रता धर्म के प्रभाव से उसके पति को पुनः जीवन प्राप्त हो गया।
इसलिए की जाती है अमावस्या के दिन पीपल की पूजा
इस कथा के आधार पर ही माना जाता है कि अमावस्या के दिन पीपल वृक्ष की पूजा, परिक्रमा और दान करने से सौभाग्य की वृद्धि होती है। पीपल में देवताओं का वास माना गया है, इसलिए इसकी पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है। कई स्थानों पर अमावस्या के दिन 108 वस्तुओं की भंवरी देने की परंपरा भी प्रचलित है।