Devshayani Ekadashi 2026: आषाढ़ शुक्ल एकादशी को होगा देवशयनी एकादशी व्रत और शुरू होंगे चतुर्मास, जानें क्या है और क्यों लगता है चतुर्मास

Devshayani Ekadashi 2026: हिंदू धर्म में देवशयनी एकादशी को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु इस दिन से चार माह की योग निद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद से चतुर्मास लगता है और मांगलिक कार्य रुक जाते हैं। आइए जानें इसका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

अपडेटेड Jul 08, 2026 पर 7:09 PM
आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवशयनी एकादशी का व्रत किया जाता है।

Devshayani Ekadashi 2026: आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवशयनी एकादशी का व्रत किया जाता है। हिंदू धर्म में इस तिथि का खास महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस संसार के संचालक भगवान विष्णु इस दिन से चार माह की योग निद्रा में चले जाते हैं। इसलिए इसे देवशयनी या हरिशयनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस दिन के बाद से चतुर्मास शुरू होते हैं और अगले चार माह तक मांगलिक कार्य रुक जाते हैं। यानी इस दौरान शादी, मुंडन, जनेऊ और गृह प्रवेश जैसे शुभ और मांगलिक कार्यो के मुहूर्त नहीं होते। चतुर्मास देवशयनी एकादशी से लेकर देवउठनी एकादशी तक की अवधि को कहा जाता है। आइए जानें इस साल हरिशयनी एकादशी कब है और इसका धार्मिक/आध्यात्मिक महत्व क्या है?

कब है देवशयनी एकादशी 2026?

देवशयनी एकादशी : शनिवार, 25 जुलाई, 2026

देवशयनी एकादशी तिथि का प्रारम्भ : 24 जुलाई 2026 को सुबह 09:12 बजे

एकादशी तिथि समाप्त : 25 जुलाई 2026 को सुबह 11:34 बजे

व्रत पारण का समय : 26 जुलाई, सुबह 05:39 बजे से सुबह 08:22 बजे तक


26 जुलाई 2026 द्वादशी समापन : दोपहर 01:57 बजे

देवशयनी एकादशी 2026: धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

देवशयनी एकादशी के बाद से चतुर्मास प्रारंभ होता है। देवशयनी एकादशी तिथि और चतुर्मास का बहुत गहरा धर्मिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व है। इसे समझने के लिए आइए जानें ये 3 कारण

श्री हरि ने दिया था दानवीर राजा बलि को वचन

वामन अवतार में भगवान विष्णु ने दानवीर दैत्यराज बली से तीन पग में तीनों लोक नाप लिए थे। तब बली की दानवीरता से प्रसन्न होकर उन्होंने बली को पाताल लोक का राजा बना दिया और खुद भी उसके साथ पाताल चलने का वचन दे दिया। इससे चिंतित माता लक्ष्मी ने राजा बली को रक्षासूत्र (राखी) बांधकर उनसे उपहार स्वरूप भगवान विष्णु को मांग लिया। लेकिन भगवान विष्णु अपने भक्त बली को निराश नहीं करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने बली को वरदान दिया कि वे हर साल आषाढ़ शुक्ल एकादशी यानी देवशयनी एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी अर्थात् देवप्रबोधिनी एकादशी तक पाताल लोक में रहकर राजा बली के महल का पहरा देंगे। इसी समय को भगवान विष्णु का शयनकाल माना जाता है।

चतुर्मास का वैज्ञानिक और प्राकृतिक कारण

चातुर्मास का आरंभ आषाढ़ महीने के अंत में होता है, जब बारिश का मौसम होता है। बारिश के कारण हवा और पानी में कई संक्रामक बीमारियां तेजी से पनपती हैं। हमारी पाचन शक्ति भी इस दौरान कमजोर हो जाती है। इस मौसम में नदियां भी उफान पर होती हैं और रास्ते बंद हो जाते हैं। इसलिए पहले के समय में साधु-संतों और लोगों को एक ही स्थान पर रुककर ईश्वर भक्ति करने की सलाह दी गई, ताकि वे सुरक्षित रह सकें।

मांगलिक कार्यों पर रोक का कारण

माना जाता है कि चतुर्मास में ब्रह्मांडीय ऊर्जा और मौसम में काफी बदलाव होते हैं। सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु का प्रभाव इस दौरान आंतरिक साधना की ओर मुड़ जाता है, इसलिए शादी, मुंडन, गृह प्रवेश आदि मांगलिक कार्य रोक दिए जाते हैं।

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