Holi 2026: होली का नाम सुनते ही पैर अपने आप थिरकने लगते हैं, होठों पर लोकगीतों की धुनें तैरने लगती हैं और जबान पर गुझिया-पुआ का स्वाद ताजा हो उठता है। ये त्योहार हर साल चैत्र मास की प्रतिपदा के दिन मनाया जाता है। इस साल ये पर्व आज 4 मार्च 2026 को मनाया जा रहा है। बसंत के महीने में आने वाले इस त्योहार के साथ सर्दियों के मौसम की पारंपरिक तौर से विदाई हो जाती है। इस लेकिन इस त्योहार का महत्व बस इतना ही नहीं है। इस पर्व के धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस त्योहार पर भगवान विष्णु, भगवान शिव, भगवान नरसिंह और अग्नि देव की पूजा का विधान बताया गया है। आइए जानें इसका धार्मिक महत्व और पूजा विधि
होलिका दहन और भक्त की रक्षा का संदेश नरसिंह भगवान प्रह्लाद होलिका दहन की रात जब लकड़ियां जलती हैं और लोग अग्नि की परिक्रमा करते हैं, तब सिर्फ एक रस्म नहीं निभाई जाती, बल्कि एक भक्त प्रह्लाद की कथा याद की जाती है। उनकी रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लिया था और अत्याचारी हिरण्यकश्यप का अंत किया था। इसलिए होलिका दहन के समय नरसिंह भगवान की तस्वीर के सामने दीप जलाते हैं।
सृष्टि के संरक्षक भगवान विष्णु का होली की कथा में अहम स्थान माना जाता है। कुछ परंपराओं में धुलेंडी के दिन विष्णु पूजा का विधान बताया गया है। बहुत से लोग रंग खेलने से पहले घर के मंदिर में दीप जलाते हैं। मान्यता है कि इससे जीवन में संतुलन और परिवार में सुख बना रहता है।
होली का संबंध भगवान शिव की कथा से भी जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि कामदेव ने जब उनकी तपस्या भंग करने की कोशिश की, तब शिव ने उन्हें भस्म कर दिया। बाद में करुणा से पुनर्जीवन का आशीर्वाद भी दिया। इस प्रसंग को लोग आत्मसंयम और संतुलन के प्रतीक के तौर पर देखते हैं। कई श्रद्धालु होली के दिन शिव मंदिर में पूजा करते हैं और जल चढ़ाते हैं।
ब्रज की होली और कृष्ण भक्ति श्रीकृष्ण मथुरा वृंदावन ब्रज की होली की बात ही अलग है। मथुरा और वृंदावन में रंगों का उत्सव कई दिन पहले शुरू हो जाता है। लोककथाओं में बताया जाता है कि श्रीकृष्ण ने राधा और गोपियों के साथ रंग खेलकर इस परंपरा की नींव रखी। यहां होली सिर्फ रंग नहीं, भक्ति का उत्सव है। मंदिरों में भजन, कीर्तन और फूलों की होली होती है।