इस साल श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व विशेष होने वाला है। गृहस्थ और वैष्णव दोनों संप्रदाय इस बार एक ही दिन, शनिवार 16 अगस्त को व्रत करेंगे। पंचांग के अनुसार इस बार तिथि और नक्षत्र का ऐसा संयोग बन रहा है, जिसे जन्माष्टमी के लिए बेहद शुभ माना जाता है। अष्टमी तिथि का आरंभ 15 अगस्त की रात को होगा और अगले दिन तक चलेगा। इसी दौरान शनिवार की रात चंद्रोदय और रोहिणी नक्षत्र का योग बनेगा। पारंपरिक मान्यता के अनुसार जन्माष्टमी के उपवास और पूजन के लिए चंद्रोदय और रोहिणी नक्षत्र का एक साथ होना बहुत पावन माना जाता है।
यही कारण है कि इस वर्ष दोनों संप्रदाय एकमत होकर उसी दिन व्रत और भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करेंगे। भक्तों का मानना है कि इस शुभ संयोग में पूजा करने से श्रीकृष्ण की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
6 शुभ संयोग से और पावन बनेगी जन्माष्टमी
इस बार जन्माष्टमी पर कुल छह दुर्लभ योग बन रहे हैं अमृतसिद्धि, सर्वार्थसिद्धि, वृद्धि, ध्रुव, श्रीवत्स, गजलक्ष्मी और बुधादित्य योग। मान्यता है कि ये संयोग पूजा को अत्यंत फलदायी बनाते हैं और भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त करना आसान होता है।
पूजा का समय और पारण का मुहूर्त
निशीथ पूजा: रात 12:04 बजे से 12:47 बजे तक (17 अगस्त की मध्यरात्रि)
पारण समय: व्रत तोड़ने का समय 17 अगस्त सुबह 5:51 बजे के बाद।
जन्माष्टमी पर पूजा की विधि
भगवान श्रीकृष्ण के लिए मंत्र
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः॥
लड्डू गोपाल स्तुति के मुख्य भाव
भगवान श्रीकृष्ण विश्व के पालनहार और आनंद के स्रोत हैं।
वे गोवर्धनधारी, गोपीनाथ, पापों का नाश करने वाले और भक्तों के रक्षक हैं।
उनके नाम के स्मरण मात्र से कष्ट दूर होते हैं और जीवन में शांति आती है।
रात्रि पूजन के समय आरती कुंजबिहारी की गाने का विशेष महत्व है। इसमें भगवान के दिव्य स्वरूप, उनकी मुरली की मधुर धुन, राधारानी के साथ उनका अनुपम सौंदर्य और भक्तों के प्रति उनका स्नेह भाव का सुंदर वर्णन मिलता है।
इस बार जन्माष्टमी पर गृहस्थ और वैष्णव दोनों संप्रदाय एक ही दिन उपवास रखेंगे। दुर्लभ योग और विशेष पूजा विधियों के कारण ये जन्माष्टमी अत्यंत शुभ मानी जा रही है। भक्ति के इस पर्व पर सिर्फ भगवान कृष्ण की पूजा ही नहीं, बल्कि गाय की सेवा और सात्विक जीवन का पालन भी अहम संदेश देता है।