हिंदू धर्म में उपवास केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और संयम का अभ्यास भी है। इन्हीं व्रतों में से एक है निर्जला एकादशी, जिसे वर्ष की सबसे कठिन एकादशी माना जाता है। ये व्रत न केवल आस्था की परीक्षा लेता है, बल्कि पूरे साल की एकादशियों का पुण्यफल देने वाला भी माना गया है। निर्जला एकादशी ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष में आती है और इसका विशेष नियम है—एक बूंद पानी तक न पीना। ऐसे में ये व्रत न सिर्फ शारीरिक तपस्या है, बल्कि आत्मिक अनुशासन का प्रतीक भी है।
इसे करने से व्यक्ति को भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन के संकट दूर होने का विश्वास होता है। इस दिन व्रती प्रभु भक्ति, दान और संयम के साथ अपना पूरा दिन समर्पित करते हैं। ये उपवास मन, वचन और कर्म की शुद्धि का एक गहन अभ्यास है।
इस बार निर्जला एकादशी दो अलग-अलग तिथियों पर मनाई जा रही है।
6 जून 2025: गृहस्थ (सामान्य जन) इस दिन व्रत कर सकते हैं।
7 जून 2025: वैष्णव संप्रदाय के अनुयायी इस दिन व्रत रखेंगे।
भारतीय विद्वत परिषद ने स्पष्ट किया है कि दोनों तिथियां शास्त्र सम्मत हैं और अपने-अपने संप्रदाय के अनुसार मान्य हैं।
निर्जला एकादशी का विशेष नियम
निर्जला एकादशी को विशेष इसलिए माना जाता है क्योंकि इस दिन व्रती को जल तक नहीं पीना होता। यह उपवास पूरी तरह निर्जल होता है। केवल अगले दिन द्वादशी तिथि पर व्रत का पारण करने के बाद ही जल ग्रहण किया जा सकता है।
निर्जला एकादशी की पूजा विधि
प्रात: स्नान और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
सूर्यदेव को अर्घ्य दें और केले के पेड़ को जल चढ़ाएं।
श्रीहरि विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करें।
उन्हें पीले फूल, फल, दीप, धूप और नैवेद्य अर्पित करें।
विष्णु मंत्रों और लक्ष्मी मंत्रों का जाप करें।
पूजा के अंत में आरती उतारें और क्षमा याचना करें।
प्रसाद वितरण कर व्रत का संकल्प लें।
निर्जला एकादशी का व्रत अगले दिन द्वादशी तिथि में फलाहार या अन्न-जल ग्रहण कर के पूरा किया जाता है। इसे पारण कहा जाता है और यह व्रत की पूर्णता का प्रतीक होता है।
क्यों कहा जाता है इसे सबसे श्रेष्ठ व्रत?
निर्जला एकादशी को सबसे पुण्यदायी इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये न सिर्फ कठोर संयम की परीक्षा है, बल्कि इसका फल भी अनेक गुना होता है। ये व्रत आत्मिक शुद्धि, मानसिक शक्ति और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का माध्यम है।