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Parama Ekadashi 2026 Katha: सर्वार्थ सिद्धि योग में परमा एकादशी व्रत आज, पूजा के संपूर्ण फल के लिए जरूरी पढ़ें ये व्रत कथा

Parama Ekadashi 2026 Katha: आज ज्येष्ठ अधिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि है। आज पूरे दिन सर्वार्थ सिद्धि योग रहेगा और परमा एकादशी इसमें ही किया जाएगा। इस व्रत में यहां दी जा रही कथा जरूर पढ़नी और सुननी चाहिए। आइए जानें इसके बारे में

MoneyControl Newsअपडेटेड Jun 11, 2026 पर 7:00 AM
Parama Ekadashi 2026 Katha: सर्वार्थ सिद्धि योग में परमा एकादशी व्रत आज, पूजा के संपूर्ण फल के लिए जरूरी पढ़ें ये व्रत कथा
ज्येष्ठ अधिक मास में परमा एकादशी व्रत करने से सुमेधा और उसके परिवार की गरीबी मिट गई।

Parama Ekadashi 2026 Katha: हिंदू धर्म में कुछ तिथियां अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। प्रत्येक हिंदू मास के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि ऐसी ही एक तिथि है। भगवान विष्णु को समर्पित इस तिथि का महत्व अधिक मास में और भी बढ़ जाता है। हिंदू कैलेंडर के किसी महीने में जुड़ने वाले अतिरिक्त महीने के स्वामी खुद श्री हरि हैं। इसलिए इसमें आने वाली एकादशी तिथियां भी बेहद अहम मानी जाती हैं। इस साल ज्येष्ठ मास में अधिक मास का संयोग बना है।

आज ज्येष्ठ अधिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि है। इस दिन परमा एकादशी का व्रत किया जाता है। इस एकादशी का व्रत हर 3 साल में एक बार आता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति परमा एकादशी का व्रत रखकर विधिपूर्वक श्रीहरि की पूजा करता है, उसे दुख और दरिद्रता से मुक्ति मिल जाती है। उसके घर-परिवार में धन, धान्य, यश और कीर्ति में वृद्धि होती है। इस व्रत की पूजा परमा एकादशी व्रत कथा के बिना अधूरी मानी जाती है। परमा एकादशी पर पूरे दिन सर्वार्थ सिद्धि योग बनने से यह दिन और भी पावन हो गया है।

परम एकादशी व्रत कथा

एक बार युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से अधिकमास के कृष्ण पक्ष के एकादशी व्रत और उसके महत्व के बारे में जानने की इच्छा जताई। तब भगवान कृष्ण ने उन्हें बताया कि इसे परमा एकादशी या पुरुषोत्तमी एकादशी कहा जाता है। इस व्रत को करने से पाप, रोग, दोष, कष्ट आदि से मुक्ति मिलती है।

बहुत समय पहले काम्पिल्य नगर में सुमेधा नाम का एक ब्राह्मण था। वह अपनी पत्नी के साथ रहते थे। सुमेधा की पत्नी नियमपूर्वक व्रत, पूजा, पाठ आदि करती थी। खुद कष्ट में रह कर अतिथियों का आदर-सत्कार और उनकी सेवा करती थी। दोनों पति-पत्नी का जीवन गरीबी में व्यतीत हो रहा था।

एक दिन सुमेधा ने अपनी पत्नी से कहा कि धन कमाने के लिए उसे परदेस जाना होगा। यहां पर जो धन कमाते हैं, उतने से परिवार नहीं चल पा रहा है। इस पर उसकी पत्नी ने कहा कि व्यक्ति को अपने भाग्य और पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार ही फल मिलता है। पत्नी की बात सुनकर सुमेधा परदेस नहीं गया। एक दिन उसके घर पर कौण्डिन्य ऋषि पधारे। सुमेधा और उसकी पत्नी ने उनकी खूब सेवा की, जिससे कौण्डिन्य ऋषि बहुत प्रसन्न हुए। पति-पत्नी ने कौण्डिन्य ऋषि से अपनी गरीबी दूर करने के लिए उपाय पूछा।

तब कौण्डिन्य ऋषि ने कहा कि तुम दोनों अधिकमास की परमा एकादशी का व्रत विधि विधान से करो। उन्होंने परमा एकादशी व्रत और पूजा की विधि बताई। जब अधिकमास की परमा एकादशी आई तो उन दोनों ने कौण्डिन्य ऋषि के बताए अनुसार व्रत रखा और श्रीहरि विष्णु की पूजा की। उसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराया और दान-दक्षिणा देकर विदा किया। उसके बाद पारण करके व्रत को पूरा किया।

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