इस वर्ष वराह जयंती का पर्व विशेष संयोग लेकर आ रहा है। पौराणिक मान्यता है कि इसी दिन भगवान विष्णु ने राक्षस हिरण्याक्ष का वध कर पृथ्वी को पाताल लोक से मुक्त कराने के लिए वराह अवतार धारण किया था। इस अवसर पर तृतीया तिथि का प्रारंभ 25 अगस्त को दोपहर 12:35 बजे होगा और इसका समापन 26 अगस्त को दोपहर 1:54 बजे होगा। श्रद्धालुओं के लिए पूजा का शुभ समय 25 अगस्त को दोपहर 1:40 बजे से शाम 4:15 बजे तक तय की गई है। इस पावन अवसर पर भगवान विष्णु के वराह स्वरूप की आराधना करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है और नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है।
श्रद्धालु व्रत, पूजा और कथा-पाठ के माध्यम से भगवान के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हैं। ये दिन न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि आध्यात्मिक शक्ति और आंतरिक शांति प्रदान करने वाला भी माना जाता है।
वराह जयंती का धार्मिक महत्व
हिरण्याक्ष, भक्त प्रह्लाद के पिता हिरण्यकशिपु का छोटा भाई था जिसने तीनों लोकों में आतंक मचा दिया था। भगवान विष्णु के इस अवतार की स्मृति में वराह जयंती मनाई जाती है। कहा जाता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है। ये दिन भक्तों को साहस, शक्ति और बुराइयों से मुक्ति का संदेश देता है।
प्रातः स्नान कर मन को पवित्र करें और व्रत का संकल्प लें।
घर के पवित्र स्थान पर भगवान विष्णु के वराह स्वरूप की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
धूप, दीप, पुष्प और नैवेद्य अर्पित करके हिरण्याक्ष वध की कथा का पाठ करें।
पूजा पूर्ण होने के बाद भगवान विष्णु अथवा वराह अवतार की आरती करें और परिवार सहित प्रसाद ग्रहण करें।
मान्यता है कि वराह जयंती पर किए गए व्रत और पूजा से जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति मिलती है और घर परिवार में खुशहाली का वातावरण बनता है। श्रद्धा और आस्था के साथ किया गया यह अनुष्ठान न केवल पापों का नाश करता है बल्कि आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग भी प्रशस्त करता है।