स्पीति घाटी की ऊंची पहाड़ियों के बीच बसा गांव अपनी खूबसूरती के साथ-साथ यहां की मुश्किल जिंदगी के लिए भी जाना जाता है। करीब 15 हजार फीट की ऊंचाई पर होने की वजह से यहां का मौसम काफी ठंडा रहता है और हवा में ऑक्सीजन भी कम होती है। ऐसे में यहां रहना किसी चुनौती से कम नहीं है। पेड़-पौधों का उगना भी आसान नहीं होता, लेकिन इसके बावजूद गांव के लोग इन कंडीशन के साथ खुद को ढालकर अपनी रोज की जिंदगी जीते हैं।
हाल ही में एक व्लॉग ने कोमिक गांव की इसी अनोखी जिंदगी को लोगों के सामने दिखाया। वीडियो में ऊंचाई, ठंड और कम ऑक्सीजन के बीच गांव का माहौल और यहां रहने वाले लोगों की दिनचर्या देखने को मिलती है। वीडियो वायरल होने के बाद लोग यह जानना चाहते हैं कि आखिर इतनी ऊंचाई पर लोग कैसे रहते हैं और इतनी कठिन कंडीशन के बावजूद यहां की जिंदगी कैसी है।
कोमिक गांव करीब 15 हजार फीट की ऊंचाई पर बसा है, इसलिए यहां मैदानी इलाकों की तुलना में ऑक्सीजन काफी कम मिलती है। यहां पहुंचने पर बाहर से आने वाले लोगों को सांस लेने में परेशानी हो सकती है और शरीर जल्दी थकने लगता है। लेकिन कई जनरेशन से यहां रहने वाले लोकल लोगों को इस वातावरण की आदत हो चुकी हैं। उनका शरीर कम ऑक्सीजन वाली कंडीशन के हिसाब से खुद को ढाल चुका है, इसलिए वे खेती, घर के काम और दूसरे रोज के काम करते रहते हैं।
कोमिक कोल्ड डेजर्ट इलाके में आता है, जहां सर्दियों में टेम्परेचर बहुत नीचे चला जाता है। ऐसी ठंड से बचने के लिए यहां के लोग करीब दो फीट मोटी दीवारों वाले मिट्टी के घर बनाते हैं। इन घरों की मोटी दीवारें अंदर की गर्मी को बनाए रखने में मदद करती हैं। घरों को सफेद रंग से रंगा जाता है, ताकि पहाड़ों की तेज धूप और गर्मी को कुछ हद तक संभाला जा सके। सर्दियों में पानी जमने की वजह से यहां ड्राई टॉयलेट का भी इस्तेमाल किया जाता है।
ग्लेशियर का पानी और ट्रेडिशनल खाना
इतनी ऊंचाई और ठंड के बावजूद कोमिक के लोगों के लिए पानी का इंतजाम प्रकृति ही करती है। यहां ग्लेशियर से आने वाली एक धारा से पानी मिलता है, जो सर्दियों में भी पूरी तरह नहीं जमती। खाने में भी चीजों का इस्तेमाल ज्यादा होता है। जौ का सत्तू, गाय का घी, पनीर और शक्कर से तैयार ट्रेडिशनल खाना यहां की खासियत है, जो ठंडे मौसम में शरीर को एनर्जी देता है।
कोमिक और आसपास का पूरा इलाका देखने में आम पहाड़ी जगहों से काफी अलग है। यहां हरियाली कम और चारों तरफ सूखे, भूरे और ऊबड़-खाबड़ पहाड़ दिखाई देते हैं। हवा और पानी के लंबे समय तक हुए कटाव ने पहाड़ों को अलग-अलग आकार दे दिया है, जिससे पूरा इलाका किसी दूसरे ग्रह जैसा नजर आता है। पास के लांग्जा गांव में पुराने समुद्री जीवों के जीवाश्म भी मिलते हैं, जो बताते हैं कि हिमालय बनने से पहले इस एरिया का रिश्ता समुद्र से रहा होगा।
कोमिक में घरों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन यहां रहने वाले लोगों के बीच आपसी सहयोग देखने को मिलता है। किसी एक घर में शादी, त्योहार या कोई इवेंट हो, तो पूरा गांव मिलकर काम में हाथ बंटाता है। इतनी ठंड में रोज की जरूरतें पूरी करना आसान नहीं होता, इसलिए लोग स्थानीय संसाधनों का ही इस्तेमाल करते हैं। जानवरों के गोबर को सुखाकर ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है और जरूरत पड़ने पर जानवरों को भी ठंड से बचाने के लिए घर के अंदर रखा जाता है। इन मुश्किल कंडीशन के बीच लोगों का यह साथ और अपनापन कोमिक की जिंदगी को खास बनाता है।