केरल के इडुक्की जिले का मशहूर हिल स्टेशन मुन्नार एक बार फिर सुर्खियों में है। अभी यहां की पहाड़ियां हरियाली से लिपटी हुई हैं, लेकिन जल्द ही इनका रंग पूरी तरह बदल सकता है। पहाड़ियों पर नीलकुरिंजी के शुरुआती फूल दिखाई देने लगे हैं। अगर मौसम अनुकूल रहा तो सितंबर-अक्टूबर तक पूरी घाटियां नीले और बैंगनी रंग से ढकी नजर आएंगी। यही वजह है कि प्रकृति प्रेमियों और पर्यटकों में अभी से उत्साह बढ़ने लगा है।
सिर्फ 12 साल में एक बार खिलता है यह अनोखा फूल
नीलकुरिंजी दुनिया के उन चुनिंदा पौधों में शामिल है, जो हर साल नहीं बल्कि 12 साल में सिर्फ एक बार सामूहिक रूप से खिलते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम स्ट्रोबिलैंथेस कुंथियाना (Strobilanthes kunthiana) है। फूल आने के बाद पौधे बीज बनाते हैं और फिर सूख जाते हैं। इसके बाद नए पौधे तैयार होते हैं और अगले 12 सालों तक फूल आने का इंतजार करना पड़ता है। यही अनोखा जीवन चक्र इसे बेहद खास बनाता है।
कब और कहां खिलते हैं नीलकुरिंजी के फूल?
यह दुर्लभ फूल आमतौर पर जुलाई से अक्टूबर के बीच पश्चिमी घाट के 1300 से 2400 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में खिलता है। मुन्नार के राजामाला, कोविलूर, कडावरी और एराविकुलम नेशनल पार्क इसकी सबसे प्रसिद्ध जगहों में गिने जाते हैं। जब लाखों फूल एक साथ खिलते हैं तो पूरी पहाड़ियां नीले रंग की चादर ओढ़ लेती हैं।
नाम के पीछे भी छिपी है दिलचस्प कहानी
'नीलकुरिंजी' नाम तमिल भाषा से लिया गया है। इसमें 'नीला' का मतलब नीला रंग और 'कुरिंजी' का अर्थ पर्वतीय इलाकों में खिलने वाला फूल माना जाता है। माना जाता है कि नीलगिरी पर्वत का नाम भी इसी फूल से जुड़ा है, क्योंकि इसके खिलने पर दूर-दूर तक पहाड़ियां नीली दिखाई देती हैं।
आदिवासी समुदाय के लिए सिर्फ फूल नहीं, समय का पैमाना
तमिलनाडु के पलियन जनजातीय समुदाय के लिए नीलकुरिंजी का खास सांस्कृतिक महत्व है। वे इसके 12 साल के खिलने वाले चक्र का इस्तेमाल उम्र गिनने और जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं को याद रखने के लिए करते रहे हैं। वहीं केरल के कई आदिवासी समुदाय इस मौसम को जंगली शहद इकट्ठा करने की शुरुआत भी मानते हैं।
पर्यावरण के लिए भी है बेहद अहम
नीलकुरिंजी केवल खूबसूरती नहीं बढ़ाता, बल्कि पश्चिमी घाट के पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। इसके फूलों का रस मधुमक्खियों के लिए भोजन का बड़ा स्रोत होता है, जिससे खास किस्म का शहद तैयार होता है। वैज्ञानिक इसे पश्चिमी घाट के स्वस्थ पर्यावरण का संकेत भी मानते हैं।
बढ़ती भीड़ और सिमटता प्राकृतिक घर
इस दुर्लभ नजारे को देखने हर बार हजारों पर्यटक मुन्नार पहुंचते हैं। प्रशासन के सामने चुनौती यह रहती है कि पर्यटन बढ़े, लेकिन पश्चिमी घाट की नाजुक जैव विविधता को नुकसान न पहुंचे। दूसरी ओर, चाय बागानों का विस्तार, निर्माण कार्य और शहरीकरण के कारण नीलकुरिंजी का प्राकृतिक आवास लगातार कम हो रहा है।
इसीलिए बनाया गया विशेष संरक्षित क्षेत्र
इस दुर्लभ फूल को बचाने के लिए केरल के इडुक्की जिले में कुरिंजीमाला सैंक्चुअरी बनाई गई है। यहां नीलकुरिंजी और उसके प्राकृतिक आवास के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाता है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस अनोखे प्राकृतिक चमत्कार को देख सकें।