नौकरी की शुरुआत अक्सर सैलरी से होती है, लेकिन कई बार सालों के साथ रिश्ता सिर्फ काम और पैसे तक सीमित नहीं रहता। लेखक और उद्यमी अंकुर वारिकू ने अपने परिवार के ड्राइवर दयानंद की कहानी शेयर करते हुए कुछ ऐसा ही अनुभव बताया। दयानंद पिछले 13 साल से उनके परिवार के साथ हैं और इस दौरान उनकी भूमिका एक ड्राइवर से बढ़कर भरोसेमंद साथी जैसी हो गई।
13 साल पहले 15 हजार थी सैलरी
वारिकू के मुताबिक, दयानंद ने करीब 13 साल पहले उनके परिवार के साथ 15,000 रुपये महीने की सैलरी पर काम शुरू किया था। आज उन्हें 53,350 रुपये प्रति माह मिलते हैं। इसके अलावा उनके परिवार को हेल्थ इंश्योरेंस, दिवाली पर एक महीने की अतिरिक्त सैलरी और एक स्कूटी जैसी सुविधाएं भी दी जाती हैं।
ड्राइवर से बढ़कर परिवार का भरोसेमंद सदस्य
वारिकू ने बताया कि समय के साथ दयानंद का काम सिर्फ गाड़ी चलाने तक नहीं रहा। वह परिवार के बच्चों को उनकी क्लास और दूसरी गतिविधियों तक ले जाते हैं, जरूरी काम संभालते हैं और घर की डुप्लीकेट चाबियां भी उनके पास रहती हैं।
यानी परिवार ने उन्हें सिर्फ कर्मचारी नहीं, बल्कि ऐसा व्यक्ति माना जिस पर घर और परिवार की सुरक्षा को लेकर आंख बंद करके भरोसा किया जा सके।
सुबह 4:30 बजे उठना और समय की पाबंदी
वारिकू ने दयानंद की दिनचर्या और काम के प्रति रवैये की भी तारीफ की। उनके अनुसार, दयानंद सुबह करीब 4:30 बजे उठते हैं और रात 8:30 बजे तक सो जाते हैं। वह समय के बेहद पाबंद हैं और काम में कभी देर नहीं करते। उनकी जिम्मेदारी और सकारात्मक रवैये ने परिवार का भरोसा और मजबूत किया।
‘वह हमारा समय और मानसिक तनाव बचाते हैं’
वारिकू के मुताबिक, दयानंद की अहमियत सिर्फ उनके द्वारा किए जाने वाले काम में नहीं है। वह परिवार के कई रोजमर्रा के काम संभालकर उनका समय और मानसिक बोझ कम करते हैं। इसी वजह से वारिकू ने उन्हें परिवार के पैसों का सबसे अच्छा निवेश बताया। उनका कहना था कि मेहनती लोगों के साथ उदार होना जिंदगी में आगे बढ़ने के सबसे भरोसेमंद तरीकों में से एक है।
सोशल मीडिया पर लोगों ने पूछ लिया- निवेश किसका?
वारिकू की पोस्ट को जहां कई लोगों ने पसंद किया, वहीं कुछ यूजर्स ने उनके ‘इन्वेस्टमेंट’ वाले नजरिए पर सवाल भी उठाए। एक यूजर ने कहा कि असल निवेश दयानंद का है, जिन्होंने 13 साल तक लगातार मेहनत करके यह भरोसा कमाया। उसके मुताबिक, हर दिन अपनी जिम्मेदारी निभाना और परिवार का विश्वास बनाए रखना दयानंद की असली मेहनत है।
13 साल की वफादारी के बाद 53 हजार पर भी सवाल
एक अन्य यूजर ने यह सवाल उठाया कि 13 साल तक लगातार काम करने और कभी देर न करने वाले कर्मचारी की सैलरी को लेकर ‘उदारता’ की बात क्यों की जा रही है। इस प्रतिक्रिया में सवाल किया गया कि इतने लंबे समय तक सेवा देने के बाद 53,350 रुपये मासिक वेतन वास्तव में कितना उचित है।
असली कहानी सैलरी से ज्यादा भरोसे की है
इस पूरी चर्चा ने एक दिलचस्प सवाल खड़ा कर दिया है क्या लंबे समय तक चलने वाले रोजगार रिश्ते की कीमत सिर्फ सैलरी से तय की जा सकती है? वारिकू के लिए दयानंद भरोसे, जिम्मेदारी और मानसिक सुकून का हिस्सा हैं। वहीं आलोचना करने वालों के लिए यह कहानी कर्मचारी की मेहनत और उसके उचित मेहनताने पर सवाल उठाती है।