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Basant Panchami at Nizamuddin Dargah:हजरत निजामुद्दीन की दरगाह पर दिखता है बसंत पंचमी निराला रूप, 700 साल से चली आ रही है परंपरा

Basant Panchami at Nizamuddin Dargah: बसंत पंचमी का पर्व हिंदू धर्म के सबसे प्रमुख पर्व और उत्सवों में से एक है। इस दिन का दिल्ली की हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर एक अलग ही रूप देखने को मिलता है। ये परंपरा यहां 700 साल से चली आ रही है और आज भी कायम है

MoneyControl Newsअपडेटेड Jan 23, 2026 पर 11:54 AM
Basant Panchami at Nizamuddin Dargah:हजरत निजामुद्दीन की दरगाह पर दिखता है बसंत पंचमी निराला रूप, 700 साल से चली आ रही है परंपरा
हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर बसंत पंचमी का पर्व 700 सालों से मनाया जाता रहा है।

Basant Panchami at Nizamuddin Dargah: बसंत पंचमी एक हिंदू पर्व है। विद्या, कला और संस्कृति की देवी मां सरस्वती को समर्पित। इसका एक दूसरा पहलू है, जो इसे ऋतु परिवर्तन से भी जोड़ता है। हमारे देश में यह दिन बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक माना जाता है। हर तरफ सबकुछ पीले रंग में सराबोर नजर आता है। पीला रंग यानी नवआगमन, शुभ शुरुआत और सकारात्मक ऊर्जा। दिल्ली में एक ऐसी जगह है जहां इस रंग की खूबसूरती और भी सुहानी नजर आती है। ये जगह है सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह, जहां बसंत पंचमी का पर्व पिछले 700 सालों से मनाया जाता रहा है और इसे मनाने की परंपरा आज भी कायम है। निजामुद्दीन दरगाह में बसंत पंचमी सांस्कृतिक सद्भाव का प्रतीक है, जहां आस्था धार्मिक सीमाओं से परे है और बसंत का स्वागत संगीत, फूलों और प्यार से किया जाता है।

बसंत का एक सूफी उत्सव

बसंत पंचमी बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है और हिंदू धर्म में इसका विशेष महत्व है। यह ज्ञान, संगीत और कला की देवी सरस्वती को समर्पित दिन है। पारंपरिक रूप से, भक्त पीले कपड़े पहनते हैं, पूजा करते हैं और मौसम के नएपन का जश्न मनाते हैं। हालांकि, निजामुद्दीन दरगाह में, यह त्योहार सूफी रहस्यवाद से प्रेरित है।

गुरु-शिष्य का अनोखा बंधन

यह परंपरा सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया के जीवन के एक भावुक पल से जुड़ी है। अपने भतीजे की मृत्यु के दुख में, वह गहरे गम में डूब गए थे। उनके शिष्य, अमीर खुसरो से अपने गुरु का दर्द देखा नहीं जा रहा था। बसंत पंचमी के दिन उन्होंने कुछ हिंदुओं को संगीत और पीले कपड़ों में बसंत पंचमी मनाते हुए देखा। यहीं से उन्हें अपने गुरु को उनके दर्द से बाहर लाने का रास्ता मिल गया। खुसरो भी बसंत के रंग में रंगो, गाते-बजाते जुलूस के साथ औलिया के पास पहुंचे और उनके पैरों में पीले फूल अर्पित कर दिए। उनके इस दिल को छू लेने वाले भाव से निजामुद्दीन औलिया की आंखों में आंसू आ गए और उनके चेहरे पर मुस्कान लौट आई। इसके बाद दरगाह में बसंत पंचमी की परंपरा का जन्म हुआ।

प्यार, भक्ति और एकता का संदेश

आज, बसंत पंचमी पर हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पीले रंग की सजावट और फूलों से जीवंत हो उठती है। परिसर फूलों से सजा होता है, अमीर खुसरो के सूफी कलाम और कव्वालियां गूंजती हैं, और भक्तों के बीच मिठाइयां बांटी जाती हैं। यहां बसंत पंचमी का पर्व प्यार, भक्ति के साथ-साथ एकता का संदेश देता है।

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