सावधान! फोन छीनने पर हिंसक हुई बेटी, माता-पिता अब हर महीने ₹65,000 खर्च कर ले रहे हैं बाउंसरों का पहरा।

अहमदाबाद में एक 16 साल की लड़की की मोबाइल की लत और हिंसक व्यवहार को काबू करने के लिए उसके माता-पिता ने ₹65,000 महीने पर 4 बाउंसर तैनात किए हैं।

अपडेटेड May 03, 2026 पर 10:15 PM
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आज के दौर में स्मार्टफोन हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है, लेकिन जब यह जरूरत से ज्यादा बढ़ जाए तो खतरनाक भी हो सकता है। गुजरात के अहमदाबाद से एक ऐसा ही चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां एक 16 साल की लड़की की मोबाइल की लत इस कदर बढ़ गई कि उसके माता-पिता को अपनी ही बेटी पर नजर रखने के लिए 4 बाउंसर तैनात करने पड़े।

क्या है पूरा मामला?

अहमदाबाद की रहने वाली यह लड़की सोशल मीडिया और फोटो-शेयरिंग एप्स की इतनी आदी हो गई थी कि वह घंटों अजनबियों से बात करती रहती थी। बात सिर्फ ऑनलाइन चैटिंग तक ही सीमित नहीं रही, वह घर से चोरी-छिपे निकलकर उन अनजान लोगों से मिलने भी जाने लगी। जब माता-पिता को इस बात की भनक लगी, तो उन्होंने बेटी का फोन छीन लिया। लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने सबको डरा दिया।

हिंसक हो गई बेटी


फोन छीनते ही लड़की का व्यवहार पूरी तरह बदल गया। वह बेहद हिंसक हो गई और उसने अपनी मां पर हमला तक कर दिया। इतना ही नहीं, गुस्से में आकर उसने अपने ऊंचे फ्लैट की खिड़की से टीवी और माइक्रोवेव जैसे बिजली के सामान नीचे फेंक दिए। परिवार के लिए स्थिति इतनी बिगड़ गई कि उन्हें अपनी सुरक्षा और बेटी की हरकतों को रोकने के लिए बाहर से मदद लेनी पड़ी।

बाउंसरों पर हर महीने 65,000 का खर्च

बेटी को गलत रास्ते पर जाने से रोकने और उसे काबू में रखने के लिए माता-पिता ने 65,000 रुपये प्रति माह के खर्च पर 4 बाउंसर काम पर रखे हैं। ये बाउंसर दो शिफ्टों में काम करते हैं और 24 घंटे लड़की पर नजर रखते हैं। उनका काम यह सुनिश्चित करना है कि वह न तो किसी गलत व्यक्ति से मिले और न ही खुद को या घर के किसी सदस्य को नुकसान पहुंचाए।

एक्सपर्ट्स की राय

मनोचिकित्सक डॉ. मृगेश वैष्णव, जो इस केस को देख रहे हैं, उनका कहना है कि कोविड-19 महामारी के बाद बच्चों में डिजिटल निर्भरता काफी बढ़ गई है। मोबाइल की यह लत अब ड्रग्स या शराब के नशे जैसी होती जा रही है। कई मामलों में स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि बच्चों को महीनों तक अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता है।

एक बढ़ता हुआ चलन

हैरानी की बात यह है कि यह इकलौता मामला नहीं है। गुजरात के ही सूरत और राजकोट जैसे शहरों में भी ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहां माता-पिता अपने बच्चों के हिंसक व्यवहार या गलत आदतों को सुधारने के लिए सिक्योरिटी एजेंसियों की मदद ले रहे हैं। बाउंसर, जिनका इस्तेमाल अक्सर वीआईपी सुरक्षा के लिए किया जाता था, अब परिवारों में अनुशासन बनाए रखने के लिए रखे जा रहे हैं।

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