नीलगाय, जिसे ब्ल्यू बुल भी कहा जाता है, एशिया की सबसे बड़ी एंटीलोप है। भारत में यह धरती, जंगल और खेतों की दुनिया में सहज महसूस करती है।
‘नीलगाय’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है ‘नीली गाय’ जो पुरुष का रंग नीला-ग्रे होता है, जबकि मादा का रंग सुनहरा-ब्राउन रहता है।
नीलगाय का शरीर भारी और मजबूत होता है और पीछे की ओर थोड़ा झुका हुआ होता है। गले की सफेद पट्टी और गर्दन के नीचे लटकती मोटी खाल इसकी पहचान है।
जानकारी के मुताबिक एक एडल्ट नर नीलगाय 120 से 300 किलोग्राम तक वजन रखता है और कंधे की ऊंचाई 1.2 से 1.5 मीटर होती है। इसी के साथ मादा थोड़ी हल्की होती है।
ये दिन में सक्रिय रहते हैं और छोटी-छोटी झुंडों में रहते हैं। इनके समूह की संख्या कभी-कभी 70 तक जा सकती है।
वहीं किसी गंभीर परिस्थिति में नीलगाय लगभग 48 किमी/घंटा तक की रफ्तार से दौड़ सकती है। इससे उसे दूर तक भागने में मदद मिलती है।
अलर्ट मोड में आने पर ये ग्रंट यानी गड़गड़ाहट जैसा शोर करते हैं। नस्ल के मां अपने बछड़ों को चूसते वक्त क्लिक की आवाज भी निकालती हैं।
नीलगाय घास, फ़ूल, नए पत्ते और कई बार खेत की फसल भी खाती है। सूखे मौसम में ये बिना पानी कुछ दिन भी गुजार सकती है।
इसके साथ ही नीलगाय की गर्भावस्था करीब 8–9 महीने होती है। इसमें आधे मामलों में जुड़वां बच्चे पैदा होते हैं। बछड़े जन्म के चार घंटे में खड़े हो जाते हैं। मां पहले माह तक उन्हें काफी गहरी जगह पर छुपा कर रखती है।
नीलगाय को हिंदू धर्म में गौ जैसा पवित्र माना जाता है। कुछ राज्यों जैसे बिहार में इसे ‘वर्मिन’ कहा गया क्योंकि यह फसलों को नुकसान पहुंचाती है। इसका दर्जा ‘Least Concern’ है, लेकिन अवैध शिकार और आवास कमी चिंता का विषय हैं।
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