भीषण गर्मी और 44 डिग्री सेल्सियस टेंप्रेचर से जूझते हुए पहले हम महंगे एसी खरीदते हैं फिर इसके चलते बिजली का भारी बिल देते हैं। यानी चौतरफा परेशानी। इसी बीच सोशल मीडिया एक्स पर रितेश नाम के एक शख्स का वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। रितेश ने भीषण गर्मी से निपटने के लिए एक कमाल का देसी जुगाड़ शेयर किया है। इनका दावा है कि सिर्फ 800 से 850 रुपये खर्च करके उन्होंने अपनी छत को पूरी तरह कूल कर दिया है। इसके बाद 44 डिग्री की तपती गर्मी में भी उनकी छत का तापमान गिरकर 28 से 30 डिग्री सेल्सियस यानी करीब 15°C तक की ठंडक। इस देसी जुगाड़ के बाद छत पर नंगे पैर घूमा जा सकता है और कमरे का पंखा बिल्कुल ठंडी हवा देने लगता है। आइए जानते हैं क्या है यह गजब का जुगाड़, यह कैसे काम करता है और इस दावे में आखिर कितना दम है।
पहले आप यहां नीचे ये वायरल वीडियो देखिए
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस वीडियो में रितेश अपनी छत पर एक खास सफेद कोटिंग दिखाते हैं। उनका दावा है कि इसे तैयार करना बेहद आसान और किफायती है। इस देसी जुगाड़ को घर पर तैयार करने के लिए उन्होंने 20 किलो कली चूना, 5 लीटर फेविकॉल DDL बाइंडर और 500 ग्राम URP (यूरिया फॉर्मेल्डिहाइड रेजिन पॉलीमर या वॉटरप्रूफिंग एजेंट) का इस्तेमाल किया है।
रितेश वीडियो में बताते हैं कि इन सभी सामग्रियों को आपस में अच्छी तरह मिक्स कर लिया जाता है (चूने को रात भर भिगोकर मिक्स करें) और फिर छत पर इसके 1 से 2 कोट लगा दिए जाते हैं। इतने कम खर्च में करीब 1000 वर्ग फुट की पूरी छत कवर हो जाती है। इसके इस्तेमाल से एसी की जरूरत बेहद कम हो जाती है।
ये देसी जुगाड़ कितना कारगर?
रितेश जिस देसी जुगाड़ की बात कर रहे हैं, वो कहीं न कहीं साइंटिफिक बैंकिंग से भी लैस है। सूर्य की किरणों का एक बहुत बड़ा हिस्सा खासकर इन्फ्रारेड रे को गहरे रंग वाली छतें तेजी से सोख लेती हैं। इस वजह से कड़कती धूप में छत की सतह का तापमान 60 से 70 डिग्री सेल्सियस या उससे भी ज्यादा पहुंच जाता है। जब छत पर सफेद रिफ्लेक्टिव कोटिंग लगाई जाती है तो यह सतह का सोलर रिफ्लेक्टेंस बढ़ा देती है और थर्मल एमिटेंस के जरिए गर्मी को वापस वायुमंडल में छोड़ देती है। ऐसे में सोलर रिफ्लेक्टेंस इंडेक्स जितना ज्यादा होगा कूलिंग उतनी ही बेहतर होगी।
वेरिफाइड रिसर्च और स्टडीज क्या कहती हैं?
वैज्ञानिक रिसर्च और आईआईटी की स्टडीज इस वीडियो के दावे को आंशिक रूप से सपोर्ट करती हैं। आईआईटी बॉम्बे, सीबीआरआई रुड़की और कई भारतीय स्टडीज के अनुसार, एक अच्छी कूल रूफ कोटिंग छत की सतह के तापमान को 10 से 20 डिग्री सेल्सियस तक कम कर सकती है।
रिसर्च के मुताबिक ऐसी कोटिंग से घर के अंदर या सीलिंग (छत के नीचे) का तापमान आमतौर पर 2 से 6 डिग्री सेल्सियस ही कम होता है। जिन घरों में डबल स्किन रूफ या अच्छा इंसुलेशन है, वहां यह फर्क 4 से 6 डिग्री तक हो सकता है। ऐसे में पूरे घर या कमरे के तापमान में 15°C की कमी आ जाना असंभव है। इसलिए वीडियो में इनडोर कूलिंग को लेकर किया गया दावा थोड़ा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया लगता है।
हालांकि दिल्ली, अहमदाबाद और राजस्थान जैसी अत्यधिक गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों में इसका सबसे ज्यादा फायदा मिलता है। इससे लगभग 15 से 25 फीसदी तक एनर्जी सेविंग होती है और एसी का लोड कम होता है। आपको बता दें कि तमिलनाडु जैसी राज्य सरकारों ने स्कूलों में कूल रूफ पहल शुरू की थी, जहां तापमान में 1.5 से 3 डिग्री सेल्सियस की कमी और बिजली बिल में भारी बचत देखी गई है।
इस देसी जुगाड़ में जो चीजें मिलाई जा रही हैं अब उन्हें जानिए
रितेश अपने देसी जुगाड़ में चूने का इस्तेमाल का दावा कर रहे हैं। यह एक पारंपरिक और बेहद सस्ता विकल्प है। इसे बहुत अच्छा रिफ्लेक्टर माना जाता है। गांवों में इसका इस्तेमाल सदियों से होता आ रहा है, लेकिन अकेला चूना ज्यादा टिकाऊ नहीं होता। फेविकॉल बाइंडर चूने की पकड़ को मजबूत करता है और छत पर उसका चिपकाव बढ़ाता है। URP छत की वॉटरप्रूफिंग में मदद करता है।
लेकिन इस जुगाड़ की सीमाएं भी हैं
ब्रांडेड कोटिंग्स की तुलना में इस देसी जुगाड़ का टिकाऊपन कम हो सकता है। धूल-मिट्टी और बारिश की वजह से सफेदी धीरे-धीरे कम होने लगती है, इसलिए सालाना मेंटेनेंस (क्लीनिंग और री-कोट) जरूरी है। 15°C इनडोर कूलिंग का क्लेम ओवरहाइप्ड है। स्टडीज बताती हैं कि असल फायदा सिर्फ 4 से 8 डिग्री सेल्सियस तक की इनडोर/सीलिंग कूलिंग का ही मिलता है। घर की ठंडक सिर्फ छत पर नहीं बल्कि दीवारों, खिड़कियों और वेंटिलेशन पर भी निर्भर करती है। सिर्फ छत सफेद करने से पूरा घर एसी जैसा ठंडा नहीं बन सकता।