हाल ही में किए गए एक चौंकाने वाले वैज्ञानिक अध्ययन ने मछली प्रेमियों के लिए सोचने पर मजबूर कर देने वाला सच सामने रखा है। इस शोध में बताया गया है कि इंसानों के खाने के लिए पकड़ी जाने वाली रेनबो ट्राउट जैसी मछलियां मरने से पहले करीब 2 से 20 मिनट तक असहनीय दर्द झेलती हैं। यह खुलासा मशहूर विज्ञान पत्रिका ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ में प्रकाशित हुआ है। रिसर्च के मुताबिक मछलियों को मारने के लिए आम तौर पर जो तरीका अपनाया जाता है, उसमें उन्हें पानी से निकालकर हवा में छोड़ दिया जाता है, जिससे उनकी मौत दम घुटने से होती है। इस दौरान मछलियां लंबे समय तक तड़पती रहती हैं।
इतना ही नहीं, कुछ जगहों पर मछलियों को बर्फ के पानी में डालकर मारा जाता है, लेकिन यह तरीका भी उनके लिए और ज्यादा तकलीफदेह साबित हो रहा है। अब वैज्ञानिकों ने इस क्रूरता को कम करने के लिए समाधान भी सुझाया है।
हवा में दम घुटना बनता है मौत का कारण
मछलियों को मारने की सबसे सामान्य तकनीक होती है एयर एस्फीक्सिएशन, यानी पानी से निकाल कर उन्हें हवा में छोड़ देना। इस दौरान मछली धीरे-धीरे ऑक्सीजन की कमी से मरती है। शोध में बताया गया कि इस प्रक्रिया में रेनबो ट्राउट को करीब 10 मिनट तक असहनीय दर्द झेलना पड़ता है।
सिर्फ 1 मिनट में शुरू हो जाती है तकलीफ
अध्ययन ने साफ किया कि मछलियां पानी से बाहर निकलने के सिर्फ एक मिनट बाद ही गहरे तनाव में चली जाती हैं। उनके शरीर में पानी और मिनरल का संतुलन बिगड़ जाता है और पीड़ा और बढ़ जाती है। अन्य मुश्किलें जैसे भीड़भाड़ या पकड़ना, इस दर्द के सामने कुछ भी नहीं हैं।
बर्फ में डालना और भी ज्यादा क्रूर
कई जगह मछलियों को मारने के लिए उन्हें बर्फ के पानी में फेंक दिया जाता है, ताकि वे ठंड से धीरे-धीरे मरें। पर ये तरीका भी उतना ही अमानवीय साबित हुआ। ठंडा पानी मछली के मेटाबॉलिज्म को धीमा कर देता है और वे और ज्यादा देर तक होश में रहकर तड़पती हैं।
इस रिसर्च में एक मानवीय विकल्प भी सुझाया गया — इलेक्ट्रिक स्टनिंग। यानी मछली को बिजली के झटके से तुरंत बेहोश करना। इससे दर्द का अहसास काफी घट सकता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, हर खर्च किए डॉलर से कई घंटे की पीड़ा घटाई जा सकती है।
इंसानियत दिखाएं, तकनीक अपनाएं
शोध के सह-लेखक व्लादिमीर अलोंसो ने कहा कि ये अध्ययन ‘वेलफेयर फुटप्रिंट फ्रेमवर्क’ पर आधारित है, जो पशु कल्याण को आंकने का पारदर्शी तरीका है। इसके जरिए दुनियाभर में मारी जाने वाली खरबों मछलियों की मौत को कम पीड़ादायक बनाया जा सकता है। ये शोध दुनिया को ये समझने में मदद करता है कि स्वाद के पीछे छिपा दर्द कैसे कम किया जाए और भोजन में मानवीयता कैसे लाई जाए।