भारत की दिग्गज आईवियर कंपनी लेंसकार्ट (Lenskart) इन दिनों एक नए विवाद के केंद्र में है। सोशल मीडिया पर एक पूर्व कर्मचारी द्वारा लगाए गए आरोपों ने कंपनी की वर्क कल्चर और धार्मिक स्वतंत्रता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुणे के एक स्टोर मैनेजर ने दावा किया है कि उनके स्टोर के ऑडिट के दौरान सिर्फ इसलिए अंक (Points) काट दिए गए क्योंकि वहां के कर्मचारी अपनी कलाई पर धार्मिक रक्षा-सूत्र यानी 'कलावा' पहने हुए थे।
विवाद की शुरुआत पुणे स्थित लेंसकार्ट के एक फ्लैगशिप स्टोर से हुई। स्टोर के पूर्व मैनेजर हर्ष हटेकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि कंपनी द्वारा आयोजित 'थर्ड-पार्टी ऑडिट' में उनके स्टोर की रेटिंग कम कर दी गई। हटेकर के अनुसार, अक्टूबर 2024 में आयुष वर्मा नामक एक व्यक्ति ने स्टोर का ऑडिट किया था। ऑडिट रिपोर्ट में "ग्रूमिंग स्टैंडर्ड्स" का हवाला देते हुए कलावा पहनने को नियमों के विरुद्ध बताया गया।
कर्मचारियों में बढ़ता आक्रोश
यह मामला केवल एक स्टोर तक सीमित नहीं है। हर्ष के पोस्ट के बाद कई अन्य वर्तमान और पूर्व कर्मचारियों ने भी अपनी आवाज बुलंद की है। आरोप है कि स्टोर ऑडिट के दौरान कलावा के अलावा बिंदी और तिलक जैसे धार्मिक प्रतीकों को भी "अनप्रोफेशनल" मानकर पेनाल्टी लगाई जाती है। कुछ दावों में यहाँ तक कहा गया है कि इन मुद्दों को लेकर एचआर (HR) से शिकायत करने पर उचित सुनवाई नहीं हुई और कुछ कर्मचारियों को नौकरी से हाथ भी धोना पड़ा।
लेंसकार्ट और पीयूष बंसल की सफाई
जैसे ही यह मामला सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, नेटिजन्स ने लेंसकार्ट को आड़े हाथों लेना शुरू कर दिया। विवाद बढ़ता देख लेंसकार्ट के संस्थापक और सीईओ पीयूष बंसल ने सार्वजनिक रूप से स्पष्टीकरण जारी किया। उन्होंने कहा कि कंपनी सभी धर्मों और उनके प्रतीकों का सम्मान करती है।
कंपनी की ओर से आधिकारिक तौर पर यह भी कहा गया कि उनकी एचआर पॉलिसी में किसी भी तरह के धार्मिक प्रतीकों को पहनने पर कोई रोक नहीं है। हालांकि, कर्मचारियों का कहना है कि कागजों पर पॉलिसी चाहे जो भी हो, ज़मीनी स्तर पर ऑडिट करने वाले लोग इसे अनुशासनहीनता के रूप में दर्ज करते हैं।
क्यों संवेदनशील है यह मुद्दा?
भारत में कलावा, तिलक या बिंदी केवल सजावट की वस्तुएं नहीं हैं, बल्कि ये गहरी धार्मिक आस्था से जुड़ी हैं। कार्यस्थल पर इन चीजों को लेकर सख्ती दिखाना अक्सर 'सांस्कृतिक असंवेदनशीलता' के रूप में देखा जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि कॉर्पोरेट कंपनियों को अपने ग्रूमिंग मानकों और व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं के बीच एक बारीक संतुलन बनाने की जरूरत है।