पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति बेहद नाजुक है, खासकर नाबालिग लड़कियों की सुरक्षा को लेकर। अक्सर देखा गया है कि गैर-मुस्लिम नाबालिग लड़कियों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर कार्रवाई नहीं होती, और जब वे न्याय की उम्मीद में अदालतों तक जाती हैं, तो उन्हें भी न्याय नहीं मिलता। इसका ताजा उदाहरण 13 वर्षीय ईसाई लड़की मारिया शाहबाज़ का मामला है। मारिया को अपहरण कर जबरन इस्लाम में धर्मांतरण कराया गया और फिर उससे शादी कर दी गई।
25 मार्च 2026 को पाकिस्तान की एक संघीय अदालत ने इस शादी को वैध ठहराया, जिससे पूरे देश में विरोध और खलबली मच गई। मारिया की उम्र सिर्फ 13 साल थी, इसलिए यह फैसला कानूनी और नैतिक रूप से विवादास्पद माना जा रहा है। लाहौर स्थित कैथोलिक चर्च ने इसे “गंभीर न्याय विफलता” बताया और कहा कि इससे नाबालिग लड़कियों की सुरक्षा पर बड़ा खतरा पैदा हुआ है।
चर्च ने फैसले की कड़ी निंदा की
लाहौर के कैथोलिक चर्च ने इस फैसले को “गंभीर न्याय विफलता” बताया। आर्चबिशप खालिद रहमत ने कहा कि ये निर्णय नाबालिग की शादी को वैध ठहराने जैसा प्रतीत होता है, खासकर जब मामला अपहरण और जबरन धर्मांतरण से जुड़ा हो। उन्होंने कहा कि इस फैसले ने समुदाय में गहरा दुख पैदा किया है।
नाबालिग और जबरन धर्मांतरण का मामला
चर्च ने कहा कि ये मामला मारिया की अपहरण और जबरन धर्मांतरण की कहानी से जुड़ा है। लड़की की सहमति स्पष्ट नहीं थी, इसलिए शादी चिंताजनक है। उन्होंने चेतावनी दी कि ये फैसला सिर्फ एक मामले तक सीमित नहीं रहेगा और देशभर में नाबालिग लड़कियों की सुरक्षा को कमजोर कर सकता है।
कानून और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों के खिलाफ
चर्च ने कहा कि ये निर्णय पाकिस्तान के कानूनों के विपरीत है, जो शादी की कानूनी उम्र 18 साल निर्धारित करते हैं। साथ ही, ये पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार प्रतिबद्धताओं के खिलाफ भी है।
न्याय व्यवस्था और सुरक्षा पर सवाल
आर्चबिशप ने कहा कि नाबालिगों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों का सही पालन नहीं हो रहा है। उन्होंने न्यायपालिका से अपील की कि सभी मामलों की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की जाए, खासकर जब अपहरण और जबरन धर्मांतरण शामिल हों।
परिवार और मानवाधिकार संगठन की प्रतिक्रिया
मारिया के परिवार के अनुसार, उन्हें 12 साल की उम्र में अपहृत कर जबरन धर्मांतरित और शादी कराई गई। मानवाधिकार संगठन Voice for Justice के अध्यक्ष जोसेफ जानसेन ने कहा कि ये फैसला खतरनाक मिसाल बनाता है और नाबालिग लड़कियों के शोषण को बढ़ावा देता है।
चर्च ने अदालत के फैसले की तुरंत समीक्षा और मामले में पारदर्शी जांच की मांग की। उन्होंने सरकार, न्यायपालिका और समाज से अपील की कि नाबालिगों की सुरक्षा और संविधानिक अधिकार सुनिश्चित किए जाएं। उन्होंने कहा, “बच्चों की सुरक्षा कोई विकल्प नहीं है, यह नैतिक, कानूनी और राष्ट्रीय जिम्मेदारी है।”